पुस्तक का नाम: माटी से मंज़िल तक –
हरिन्द्र जी की आत्मकथा
प्रस्तावना
यह आत्मकथा केवल किसी
एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, आत्मबल और संकल्प की जीवंत मिसाल है जो
भारत के लाखों ग्रामीण युवाओं की पहचान है। यह यात्रा है एक साधारण ग्रामीण बालक की,
जो कठिन परिस्थितियों में जन्म लेकर, विपरीत हालातों से लड़ता हुआ, अपने दम पर जीवन
में एक मुकाम तक पहुंचा।
हरिन्द्र जी की कहानी
उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के छोटे से गांव 'चरौवा' से शुरू होती है और दिल्ली, इलाहाबाद,
गुरुग्राम होते हुए लखनऊ में जाकर रुकती नहीं, बल्कि वहाँ से एक नए जीवन की शुरुआत
करती है। यह सफर भूख और अभाव, पारिवारिक कलह और सामाजिक विरोध, रिश्तों की उलझन और
विश्वासघात, संघर्ष और आत्म-सम्मान की लड़ाई, प्रेम और अकेलेपन से भरा हुआ है, लेकिन
हर पृष्ठ पर आत्मबल, सत्य और आगे बढ़ने की ज़िद झलकती है।
'माटी से मंज़िल तक'
जीवन की उन बारीकियों को छूती है जिन्हें सामान्यत: कोई नहीं लिखता – जैसे, मिट्टी
के आंगन में पली भूख, आँसुओं में गढ़े हुए सपने, घुप्प अंधेरे में जली ढिबरी की लौ,
और भीतर पलती एक अकथ जिजीविषा। यह कहानी उस इंसान की है, जो बार-बार टूटा, लेकिन हर
बार और मज़बूत होकर उठा।
यह आत्मकथा किसी विजयगाथा
का ढोल नहीं पीटती, यह उन चुप आवाज़ों को शब्द देती है जो भीतर से टूटी हुई होती हैं,
लेकिन बाहर से मुस्कुराना नहीं छोड़तीं। यह किताब हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन
से थक चुका है, पर हार मानना नहीं जानता।
लेखक परिचय
हरिन्द्र यादव का
जन्म 12 जून 1982 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक छोटे से गांव चरौवा में हुआ।
बचपन से ही कठिनाइयों और अभावों से जूझते हुए उन्होंने अपने जीवन को एक नई दिशा दी।
दिल्ली की झुग्गियों से लेकर गुरुग्राम की मल्टीनेशनल कंपनियों तक, और अंततः लखनऊ के
अपने सपनों के घर तक उन्होंने न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि अपने परिवार को
भी एक सम्मानजनक जीवन दिया।
सॉफ्टवेयर विकास के
क्षेत्र में वर्षों के अनुभव के साथ, हरिन्द्र यादव एक विचारशील, जुझारू और आत्मसम्मानी
व्यक्ति हैं। उनका मानना है कि जीवन में संघर्ष ही सबसे बड़ा शिक्षक है, और सच्ची सफलता
वही है जो आत्म-संतोष से मिले।
उन्होंने यह आत्मकथा
प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और समाज के सामने सच्चाई रखने के उद्देश्य
से लिखी है – ताकि उनके बच्चे, उनका समाज, और हर पाठक इस जीवनगाथा से कुछ सीख सके।
पृष्ठभूमि
यह आत्मकथा 14 अध्यायों
में विभाजित है, जिसमें लेखक ने अपने जन्म से लेकर वर्तमान तक के सभी प्रमुख जीवन प्रसंगों,
अनुभवों, संघर्षों और सफलताओं को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया है। हर अध्याय एक भावनात्मक
मोड़, एक नयी सीख और एक नई चुनौती की कहानी कहता है। यह किताब न केवल लेखक की आत्मकथा
है, बल्कि यह भारत के करोड़ों संघर्षरत परिवारों का प्रतिबिंब भी है।
यह कृति उन अनकहे,
अनसुने, और अनदेखे संघर्षों को शब्दों में पिरोने का एक प्रयास है – जिनसे जीवन आकार
लेता है। यह किताब एक प्रेरणा है – उन सभी के लिए जो मिट्टी से मंज़िल तक की यात्रा
पर निकले हैं।
अध्यायों का अवलोकन
- मिट्टी की गंध – मेरा जन्म और बचपन
- संघर्षों की पाठशाला – शिक्षा की लड़ाई
- प्रेरणा का दीप – इलाहाबाद की चुनौती
- बेटे का बोझ – दिल्ली की ओर पहला कदम
- कारखानों में काम और आत्म-सम्मान की लड़ाई
- धोखा और गिरफ्तारी – विश्वासघात का घाव
- फिर से उठ खड़ा हुआ – शिक्षा की नई राह
- संघर्ष, साजिश और दोस्ती की कसौटी
- दिल्ली की गलियों में जीवन का नया पाठ
- विद्रोह का मूल्य – सत्ता के गलियारों से
बाहर
- सच्चे दोस्त और अधूरी कहानी
- ज़िम्मेदारियाँ और नई शुरुआत
- लखनऊ – सपनों का घर और टूटती उम्मीदें
- आत्मदर्शन – जीवन की अंतिम सीखें
अध्याय 1: मिट्टी की गंध – मेरा जन्म और बचपन
12 जून 1982 की एक
सामान्य सुबह थी, लेकिन मेरे लिए वह दिन कुछ खास बन गया — क्योंकि उसी दिन मेरी इस
धरती पर पहली साँस थी। उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक छोटे से गांव 'चरौवा' में
मेरा जन्म एक बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ। हमारा गांव खेत-खलिहानों, आम के बाग़ों,
पोखरों और मिट्टी से सने रास्तों से घिरा था। वहां की हवा में एक खास तरह की गंध थी
— गोबर, मिट्टी, धूप और उम्मीद की मिली-जुली महक। शायद इसी गंध ने मेरे जीवन को आकार
दिया।
मेरे पिता, श्री सूर्यभान
यादव, अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। वे अपने समय के अनुसार पढ़े-लिखे माने जाते
थे — 70 के दशक में इंटरमीडिएट पास करना गांव में किसी उपलब्धि से कम नहीं था। परंतु,
किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ उन्हें आगे पढ़ने से रोकती
रहीं। वे खेतों में जुट गए और परिवार को संभालने लगे।
हमारे घर में खेती-बाड़ी
अच्छी थी, लेकिन बँटवारे के बाद स्थितियाँ बदल गईं। मेरे पिता जी के हिस्से में मिट्टी
का टूटा-फूटा घर आया — जिसमें दरवाज़े तक नहीं थे। रात में जानवर न घुस जाएं, इसके
लिए टाट के पर्दे लगा दिए जाते थे। एक समय ऐसा भी था जब हम बच्चे मिट्टी की फर्श पर
बोरे बिछाकर सोते थे और ऊपर से आसमान झाँकता था — मानो कहता हो, “तू अभी टूटा नहीं
है।”
परिवार में चार भाई-बहन थे — दो बड़ी बहनें, मैं और मुझसे छोटी एक बहन। मैं
घर का इकलौता बेटा था, इसलिए मेरे जन्म पर माँ-बाबूजी की आँखों में जो चमक थी, उसे
मैंने बचपन में ही पढ़ लिया था।
गांव का माहौल सादा
था लेकिन संघर्षमय। सुबह की शुरुआत हल-बैल, कोल्हू और मुर्गों की बाँग से होती थी।
औरतें कुंए से पानी भरतीं, बच्चे मिट्टी में खेलते और बूढ़े मंदिर की चौखट पर बैठकर
रामायण गाते। पर इस शांति के पीछे ताने-बाने थे – पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद और
रिश्तों की खटास। मेरे चाचा के बेटों ने जब मेरी बहन की शादी में सहयोग से इंकार किया,
तो हमारे परिवार का बँटवारा हो गया। यही वह क्षण था जब मैंने पहली बार संघर्ष का अर्थ
जाना।
बचपन में मेरी दुनिया
सिमटी थी – घर, स्कूल, खेत और मंदिर। लेकिन इस सादगी में भी एक संन्यासी संत की उपस्थिति
मेरे जीवन में विशेष रही – बाबा श्री रामसूरत दास जी। वे ग्रामसभा के मंदिर के महंत
थे – आजीवन ब्रह्मचारी, शरीर पर वस्त्र नहीं, सिर्फ खड़ाऊँ और रुद्राक्ष की माला। उनका
जीवन त्याग और सेवा का उदाहरण था।
मैं बचपन में जब उनके
पास जाता था, तो वे मुझे दूध और गुड़ खिलाते थे, अपने पैरों में बिठाकर कहानियाँ सुनाते
थे – तुलसी, मीरा, कबीर और राम की। उनके शब्द मेरे लिए वेदवाक्य थे। बाबा जी की छांव
में बैठकर मुझे पहली बार समझ आया – जीवन केवल भौतिक साधनों का नाम नहीं है, बल्कि आत्मबल
और संयम की साधना है।
मेरे पिता जी ने अपनी
सीमित आय में भी हमें पढ़ाया। माँ ढिबरी जलाकर रात को मेरे लिए रोशनी करती थीं। उन
ढिबरियों की लौ में जो आग थी, उसने मेरे अंदर सपनों की चिंगारी जला दी थी।
आज जब मैं पीछे देखता
हूँ, तो लगता है कि उस मिट्टी, उन आंसुओं, उन ढिबरियों और उन उपदेशों ने ही मुझे गढ़ा।
मेरा जन्म केवल एक बच्चे का जन्म नहीं था — वह एक यात्रा की शुरुआत थी, जो उस टूटी
झोपड़ी से चलकर एक सपनों के घर तक पहुँची। और उस यात्रा की पहली महक थी – मिट्टी की
गंध।
अध्याय 2: संघर्षों की पाठशाला – शिक्षा की लड़ाई
गांव की मिट्टी में
पले मेरे सपनों को पंख तो मिले, लेकिन उड़ान आसान नहीं थी। जब जीवन ने संघर्ष का पहला
पाठ पढ़ाना शुरू किया, तब मैं मात्र 5वीं कक्षा में था। हमारा स्कूल गांव से तीन किलोमीटर
दूर था – धूल भरी पगडंडियों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और बारिश में कीचड़ से लथपथ गलियों
से होकर जाना पड़ता था। कभी चप्पल टूट जाती, कभी नदी में पानी बढ़ जाता। लेकिन मेरे
पिताजी की एक बात हमेशा कानों में गूंजती – “बेटा, पढ़ाई ही तुझे इस मिट्टी से उठाकर
आसमान तक ले जा सकती है।”
हमारे घर में बिजली
नहीं थी। माँ खाली बोतलों में कपड़ा डालकर मिट्टी का तेल भरतीं और ढिबरी बनातीं। वही
ढिबरी मेरी रातों की दोस्त थी – उसका पीला उजाला और माँ के हाथ का गुड़-रोटी मेरे लिए
किसी स्वर्ग से कम नहीं था।
पिता जी रोज सुबह
4 बजे उठाकर पढ़ने बैठा देते। वे खुद बाहर बैठते, मुझे सर्द हवाओं में कंबल ओढ़ा देते
और ढिबरी के सामने बैठकर कहते – “जब ठंड से लड़ना सीख जाएगा, तब ही दुनिया से भी लड़
पाएगा।”
हमारे पास किताबें
कम थीं, कई बार तो दूसरे बच्चों की फेंकी हुई किताबें और कॉपियाँ इकट्ठा कर उन्हें
सिलवाकर पढ़ता। जब पहली बार दसवीं की परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी में पास हुआ, तो पूरे
गांव में चर्चा होने लगी। लोगों ने कहना शुरू किया – “सूर्यभान का लड़का कुछ करेगा।”
लेकिन यह सफलता संघर्ष
का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत थी। अब मेरी नजर बारहवीं और फिर इलाहाबाद पर थी – एक ऐसा
शहर जिसे शिक्षा का तीर्थ कहा जाता था। पर वहां जाना, उस दौर में हमारे जैसे परिवार
के लिए किसी असंभव स्वप्न से कम नहीं था।
मैंने पिता जी से
इलाहाबाद जाकर पढ़ाई की जिद की। घर की आर्थिक स्थिति डावांडोल थी, पर उन्होंने मेरे
हौसले की कद्र की। थोड़े-थोड़े पैसे जोड़कर एक दिन उन्होंने कहा – “जा बेटा, जा और
हमें गौरवान्वित कर।”
मेरे जीवन की शिक्षा
की असली लड़ाई वहीं से शुरू हुई – जब मैं पहली बार गांव की सीमाओं को पार करके अपने
सपनों के शहर की ओर चला। न जेब में पैसे थे, न साथ कोई गारंटी – बस मन में एक आग थी
और आँखों में एक सपना।
अध्याय 3: प्रेरणा का दीप – इलाहाबाद की चुनौती
सपनों और आत्मविश्वास
की गठरी लेकर जब मैंने इलाहाबाद की ओर रुख किया, तो दिल में आशा थी कि कोई तो सहारा
देगा, कोई तो कहेगा – "आओ, हम हैं तुम्हारे साथ।" लेकिन हकीकत अक्सर उम्मीदों
से अलग होती है।
मेरे फूफा जी, जिनके
दो बेटे वहाँ पहले से पढ़ाई कर रहे थे, सोचा था उनके पास रहकर कुछ दिनों तक राहत मिल
जाएगी। लेकिन जैसे ही वहाँ पहुँचा, उनका व्यवहार उम्मीद के बिल्कुल उलट था। उन्होंने
स्पष्ट कह दिया – "यहाँ नहीं रह पाओगे, खर्चा बहुत होता है, और तुम तो गरीब हो।
तुम्हारे बस का नहीं।"
उस वक्त उनका यह तिरस्कार
मेरे आत्मसम्मान पर गहरी चोट था। लेकिन मैं टूटने वालों में नहीं था। उन्होंने मुझे
अपने साथ तो नहीं रखा, लेकिन एक सस्ते कमरे की व्यवस्था करवा दी। वह कमरा, जिसकी सीलन
भरी दीवारों से भी मानो जीवन की चुनौती टपकती थी। पहली बार घर से बाहर निकला था – न
खाना बनाना आता था, न ही अकेले रहने का अनुभव।
पर ज़िंदगी ने सिखाना
शुरू कर दिया। जो नहीं आता था, उसे सीख लिया। खुद से खाना पकाना, पानी भरना, कपड़े
धोना – सब कुछ। कई बार खाने में नमक ज्यादा हो जाता, कई बार जल जाता – लेकिन आत्मनिर्भरता
की लौ धीरे-धीरे जल उठी।
मेरे पास कुछ पुरानी
किताबें थीं और बचपन से यह सुन रखा था कि या तो डॉक्टर बनो या इंजीनियर – तभी ज़िंदगी
बनेगी। बस इसी सोच के साथ इंजीनियरिंग की तैयारी शुरू की। लेकिन न कोचिंग थी, न मार्गदर्शन,
न पर्याप्त साधन। फिर भी किताबों से दोस्ती की और खुद को झोंक दिया पढ़ाई में।
पहली बार परीक्षा
दी – और असफल रहा। दिल टूटा, लेकिन हौसला नहीं। एक साल और दिया, दोबारा मेहनत की –
लेकिन फिर भी सफलता हाथ नहीं लगी। अब हालात ऐसे हो गए कि मन डगमगाने लगा। सोचने लगा,
"क्या अब वापस गाँव चला जाऊँ?" स्टेशन पर बैठ गया। ट्रेन आने में अभी समय
था, लेकिन दिल और दिमाग में प्रश्नों की रेलगाड़ी दौड़ रही थी – "अगर गाँव गया
तो लोग क्या कहेंगे? परिवार की हालत देखूँगा तो और टूट जाऊँगा। फिर से कुछ करने की
हिम्मत नहीं बचेगी।"
इन्हीं विचारों के
भंवर में बैठा था, जब स्टेशन की भीड़ में एक युवक को देखा – फटे-पुराने कपड़े, आँखों
में थकान, लेकिन चेहरा मुस्कराता हुआ। वह चाय बेच रहा था। मैंने चाय ली, और उससे पूछा
– "तुम इतनी मेहनत कैसे करते हो?" वह मुस्कराया और बोला – "साहब, मेहनत
ही तो हमारी ताकत है, और जब तक साँसें चल रही हैं, उम्मीद भी ज़िंदा है।"
उस अनजाने चायवाले
की बात मेरे दिल में कहीं गहरे उतर गई। वही क्षण मेरे लिए प्रेरणा का दीप बन गया। मैंने
तय किया – वापस नहीं जाऊँगा। ज़िंदगी ने अगर दो बार गिराया है, तो तीसरी बार उठने की
तैयारी करनी होगी।
इलाहाबाद अब मेरे
लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं था, वह मेरी तपस्या की भूमि बन गया – जहाँ संघर्ष, आत्मनिर्भरता
और आत्म-विश्वास की नींव रखी गई।
अध्याय 4: बेटे का बोझ – दिल्ली की ओर पहला कदम
स्टेशन के उस सुनसान
से प्लेटफ़ॉर्म पर बैठा मैं, सोच में डूबा था – हाथ में न कोई टिकट था, न कोई योजना।
दिल बार-बार यही कह रहा था – "अब लौटने का क्या फायदा? वहाँ जाकर भी क्या मिलेगा?
ताने, गरीबी, और टूटी हुई उम्मीदें।"
तभी मेरी नज़र प्लेटफॉर्म
पर खड़ी ट्रेन पर पड़ी – "लिच्छवी एक्सप्रेस"। बिहार के दरभंगा से चलने वाली
यह ट्रेन दिल्ली की ओर जा रही थी। यही ट्रेन पूर्वांचल और बिहार के हज़ारों युवाओं
के लिए दिल्ली पहुँचने का एक ज़रिया थी – उन युवाओं के लिए, जो गाँव की गरीबी से निकलकर
शहरों में किस्मत आज़माने निकलते थे।
दिल ने कहा –
"क्यों न दिल्ली चला जाए? वहाँ कोई जानता नहीं, दो महीने किसी फैक्ट्री में काम
करूंगा, पैसे हाथ में आएंगे और परिवार को पता भी नहीं चलेगा।"
मेरे पास कुल जमा
22 रुपये थे – दो पुराने नोट, जिनमें से एक को देखकर लगा जैसे उसने भी मुझसे पूछ लिया
हो, 'क्या सच में तुम दिल्ली जा रहे हो?' वो 22 रुपये उस समय मेरे लिए पूरी दुनिया
थे – न टिकट खरीदने के पैसे, न खाने का ठिकाना, और न ही कोई गारंटी कि कल क्या होगा।
लेकिन उस क्षण उन रुपयों में जितना आत्मविश्वास भरा था, शायद किसी बैंक बैलेंस में
नहीं होता। हिचकिचाहट ज़रूर थी, लेकिन साहस ने उंगली पकड़ ली और मैं बिना टिकट जनरल
बोगी में चढ़ गया। ट्रेन चल पड़ी – अज्ञात भविष्य की ओर।
सुबह के लगभग 8 बजे,
मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरा। आँखें हैरान थीं – ये वही दिल्ली थी, जिसे किताबों
और अख़बारों में देखा-पढ़ा था। इंडिया गेट, लाल क़िला, संसद भवन – लेकिन अब जब वहाँ
खड़ा था, तो एक अजीब-सी बेचैनी थी।
भूख ने सताया, तो
8 रुपये में छोले-भटूरे खाए। अब जेब में महज़ 14 रुपये बचे थे। मन ने कहा – "शाम
को ट्रेन से वापस लौट चलूँ।" लेकिन दिल ने फिर विरोध किया – "अब अगर पीछे
हटा, तो कभी नहीं उठ पाएगा।"
मैंने पैदल ही इंडिया
गेट की ओर चलना शुरू किया। जब वहाँ पहुँचा तो लगा – तस्वीरों में जो भव्यता थी, वो
यहाँ नहीं दिख रही। लेकिन उस जगह ने मुझे कुछ और सिखाया – कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं
होती, और हर सपना वैसा नहीं होता जैसा आँखें देखती हैं।
शाम के समय इंडिया
गेट सुनसान हो गया। रात के 9 बज चुके थे। मैं एक पेड़ के नीचे बैठ गया – सहमा, थका
हुआ और अनिश्चितता से भरा। तभी एक पुलिस वाला आया। उसने डांटा – "यहाँ बैठना मना
है। चलो हटो यहाँ से।"
मैंने विनम्र स्वर
में कहा – "कृपया रुकने दीजिए, मेरे पास कोई ठिकाना नहीं है। काम की तलाश में
यूपी से आया हूँ।"
वह पुलिसकर्मी कुछ
नरम पड़ा और बोला – "इस समय फैक्ट्रियाँ दिल्ली से बाहर शिफ्ट हो रही हैं – गाज़ियाबाद,
नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम। दिल्ली में तुम्हें काम नहीं मिलेगा। गाज़ियाबाद चले जाओ।"
मैंने उससे रास्ता
पूछा। उसने बताया – "बस स्टैंड जाओ, वहाँ से गाज़ियाबाद की बस मिलेगी। किराया
दो रुपये है।"
मैंने दो रुपये में
बस पकड़ी और निकल पड़ा – अब जेब में केवल पाँच रुपये बचे थे। रात में भूख, डर और अनिश्चितता
का घना अंधेरा था – लेकिन भीतर कहीं एक दीपक जल रहा था – उम्मीद का, आत्मबल का।
और यहीं से शुरू हुआ
असली जीवन संघर्ष – गाज़ियाबाद की अनजानी गलियों में, जहाँ न कोई पहचान थी, न सहारा
– बस एक बेटा था, जो अपने सपनों का बोझ लेकर दिल्ली की ओर पहला कदम बढ़ा चुका था।
अध्याय 5: कारखानों में काम और आत्म-सम्मान की लड़ाई
गाज़ियाबाद पहुँचना
आसान नहीं था। बस का किराया दस रुपये था, जो मेरे पास नहीं था। इसलिए मैंने पैदल ही
जाने का निश्चय किया। सुबह चार बजे चलना शुरू किया और दिनभर धूप, थकावट और भूख से जूझते
हुए शाम सात बजे गाज़ियाबाद बस स्टेशन पहुँचा। प्यास से गला सूख गया था। एक पानी वाले
से 50 पैसे का पानी माँगा, पाँच रुपये का नोट दिया तो वह गुस्से से चिल्लाया – “चेंज
कहाँ से लाऊँ?” और पैसे लौटा दिए।
थका-हारा मैं पास
के 'केलाश हॉस्पिटल' की लॉबी में जा बैठा, जहाँ लोग टीवी पर इंडिया और श्रीलंका का
मैच देख रहे थे। मैं भी उन्हीं में शामिल हो गया। रात 11 बजे भारत ने जीत दर्ज की
– राहुल द्रविड़ ने 49 रन बनाए थे। मैच खत्म होते ही टीवी बंद कर दिया गया और सबको
बाहर निकाल दिया गया।
बाहर घूमते हुए वही
पानी वाला फिर मिला। उसने मुझे पहचान लिया और पूछा – “अब तक यहीं हो? कहाँ जाना है?”
मैंने जवाब दिया – “कहीं नहीं, यूपी से आया हूँ, काम की तलाश में।” संयोगवश वह भी इलाहाबाद
का ही निकला। जब मैंने उसे अपने इलाके के बारे में बताया, तो वह थोड़ा भावुक हो गया
और बोला – “चलो मेरे साथ, रात मेरे कमरे पर रुक जाना।”
उसका कमरा बस अड्डे
के पास ही था। उसने मेरे लिए दाल-चावल पकाया। वह अनजान शहर में मिला पहला सहारा था
– एक अनजाना लेकिन नेकदिल इंसान। दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ
के मदद कर देते हैं।
अगली सुबह उसने मुझे
अपने साथ पान की दुकान पर ले जाकर पानी बेचने का काम दे दिया। बदले में दो वक्त का
खाना मिल जाता था। यह मेरी पहली नौकरी थी। रोटी की व्यवस्था हो जाने पर आत्मविश्वास
लौटने लगा।
एक दिन मैंने उससे
कहा – “भाई, कोई नौकरी ढूँढना चाहता हूँ, बताओ कहाँ जाऊँ?” उसने कहा – “यहाँ पास में
बहुत सी फैक्ट्रियाँ हैं, वहाँ जा कर देखो।”
मैं अगले दिन इंडस्ट्रियल
एरिया की तरफ़ निकल पड़ा। एक फैक्ट्री के बाहर हेल्परों की भर्ती चल रही थी। लंबी लाइन
में लग गया। इंटरव्यू में उन्होंने मेरी उम्र देखकर संदेह जताया, लेकिन जब मैंने अपनी
10वीं की मार्कशीट दिखाई, तो काम पर रख लिया। चेतावनी दी – “काम बहुत कठिन है, कर पाओगे?”
मैंने आत्मविश्वास से कहा – “हां, करूंगा।”
काम शुरू किया तो
असलियत का अंदाज़ा हुआ – लोहे के 20-20 किलो के टब उठाने पड़ते थे। कुछ घंटों तक मेहनत
की, फिर बेहोश हो गया। मुझे पानी के छींटे मारकर होश में लाया गया, फिर भला-बुरा कहकर
निकाल दिया गया।
हिम्मत नहीं हारी।
अगले दिन फिर एक फैक्ट्री पहुँचा। वहाँ भी काम मिल गया, लेकिन फ़ोटो कॉपी की ज़रूरत
थी और मेरे पास पैसे नहीं थे। वहीं के एक कर्मचारी ने मुझ पर दया दिखाते हुए 20 रुपये
दिए – वो इंसान आज भी मेरे दिल में है।
उसी ने पूछा – “कहाँ
रहते हो?” मैंने पूरी बात बताई तो उसने मुझे अपने घर चलने को कहा। वहाँ मैं उसके बेटे
को ट्यूशन पढ़ाता और घर के पौधों में पानी देता। बदले में बरामदे में सोने की जगह और
खाने की व्यवस्था मिल गई। कुछ दिन चैन से बीते।
लेकिन उस फैक्ट्री
का नियम था – हर तीन महीने में हेल्परों को हटा दिया जाता था। तीन महीने बाद मुझे भी
निकाल दिया गया। उसी दौरान मेरे पिताजी ने इलाहाबाद के पते पर एक पत्र भेजा, जो वापस
लौट आया। उन्हें चिंता हुई और वे मुझे ढूँढने इलाहाबाद पहुँच गए। कोई जानकारी नहीं
मिली तो उन्हें लगा कि शायद मैं अब इस दुनिया में नहीं रहा।
सौभाग्य से, जिस फैक्ट्री
में मैं काम करता था, वहाँ पिताजी के परम मित्र भी कार्यरत थे। एक दिन उन्होंने मुझे
देखा और चौंक गए। पहले तो विश्वास नहीं हुआ, फिर जब मैंने उन्हें सारी बात बताई तो
उन्होंने मुझे अपने घर ले जाकर पिताजी को सूचना दी।
पिताजी मुझे लेने
गाज़ियाबाद आए। वो पल बेहद भावुक था – पिता के आँसू, डांट और प्यार – सब कुछ एक साथ
मिला। उन्होंने कहा – “अगर जाना ही था, तो कम से कम बता कर जाते।”
मैं जानता था, वो
मेरी चिंता में घुले जा रहे थे। लेकिन तब तक मेरी लड़ाई खुद से, हालात से और दुनिया
से शुरू हो चुकी थी। एक जिद थी – कुछ कर दिखाने की। और यही जिद अब मेरा सबसे बड़ा हथियार
बन चुकी थी।
अध्याय 6: दर्द, धोखा और जेल की चारदीवारी
गाजियाबाद की फैक्ट्री
में काम करते हुए कुछ महीने बीत गए थे। शरीर थकता था, लेकिन आत्मा लगातार आग में तप
रही थी। मैंने तय कर लिया था कि कुछ पैसा जोड़कर फिर से पढ़ाई शुरू करूंगा। लेकिन नियति
को शायद कुछ और ही मंजूर था।
फैक्ट्री के कुछ लोग
बिहार और झारखंड से आए थे – कुछ ईमानदार, तो कुछ चालाक। उन्हीं में एक था राजू, जो
दिखावे में बड़ा सीधा-सादा लगता था। वो अक्सर मेरे साथ बैठकर चाय पीता, हालचाल पूछता
और कहता – “भाई, तू बहुत मेहनती है। एक काम है, दो दिन का, जिसमें तुझे अच्छे पैसे
मिल सकते हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
लेकिन जब उसने जोर दिया, तो मैंने पूछा – “क्या काम है?”
उसने कहा – “बस एक
गाड़ी unload करनी है, थोड़ा रात में काम है लेकिन पैसे मिलेंगे 500 रुपये। एक रात
की बात है।”
मुझे लालच तो नहीं
था, लेकिन हालात ने मुझे झुका दिया। 500 रुपये उस समय मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं
थे। मैं मान गया।
रात को तय जगह पहुंचा।
वहां तीन और लड़के थे। गाड़ी आई, हमने सामान उतारना शुरू किया। तभी अचानक पुलिस आ गई।
वो सामान चोरी का निकला। मैं घबरा गया। समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। सभी को
पकड़ लिया गया, और हमें थाने ले जाया गया।
पूछताछ में मैंने
सारी सच्चाई बता दी – कि मुझे सिर्फ मजदूरी के लिए बुलाया गया था। लेकिन पुलिस वालों
ने कहा – “सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो।”
मैं फूट-फूट कर रोने
लगा। कहा – “मुझे फँसाया गया है, मुझे नहीं पता था।” लेकिन मेरी कोई नहीं सुन रहा था।
सुबह तक मुझे हवालात में डाल दिया गया। लोहे की सलाखों के पीछे बैठा मैं, आँखों में
आँसू और दिल में दर्द लिए, सोच रहा था – क्या यही मेरी मेहनत की सजा है?
तीन दिन तक जेल में
रहा। वही रूखी-सूखी रोटी, बदबूदार बैरक और नींद उड़ाती हुई रातें। मैं टूट चुका था।
फिर एक दिन, एक अफसर आया, जिसने मेरी बात ध्यान से सुनी। फैक्ट्री सुपरवाइज़र को बुलवाया
गया, उसने मेरी सच्चाई की पुष्टि की। फिर जाकर मुझे छोड़ा गया।
बाहर आया तो दुनिया
ही बदल गई थी। मुझे समझ आ गया था – इस शहर में मासूम होना भी गुनाह है। मैंने तय कर
लिया – अब किसी पर भरोसा नहीं करूंगा। यह शहर माफ नहीं करता, और लोग बिना वजह भी धोखा
दे सकते हैं।
पर इस हादसे ने मुझे
और मज़बूत बना दिया। अब मैं डरता नहीं था, बस सतर्क रहता था। और यही सतर्कता मुझे उस
मोड़ तक ले जाने वाली थी, जहाँ मेरी ज़िंदगी फिर एक करवट लेने वाली थी।
अध्याय 7: फिर से उठ खड़ा हुआ – शिक्षा की नई राह
तीन महीने बीत चुके
थे और फैक्ट्री का कॉन्ट्रैक्ट समाप्त हो गया था। अब समय था कि मैं फिर से इलाहाबाद
लौटकर अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करूँ। मन में पढ़ाई का जज़्बा अभी भी जिंदा था। दिल्ली
छोड़ने से पहले मैं चांदनी चौक गया। वहाँ के बारे में बहुत सुना था – कपड़ों और किताबों
की मशहूर मार्केट, लाल किला और पुरानी दिल्ली की संस्कृति।
लाल किला देखने की
तमन्ना थी, सोचा अब लौट रहा हूँ तो शायद फिर मौका न मिले। वहाँ जाकर महसूस हुआ कि किताबों
और पोस्टरों में जो लाल किला भव्य लगता है, असलियत में वो कुछ साधारण सा ही प्रतीत
हुआ – जैसा इलाहाबाद का किला। कुछ किताबें खरीदीं, अपने लिए नए कपड़े लिए और एक चटाई
भी।
मैं अपने उन रिश्तेदारों
को कुछ पैसे देना चाहता था जिनके यहाँ खा-पी रहा था, लेकिन उन्होंने पैसे लेने से इनकार
कर दिया। मेरे पास लगभग आठ हज़ार रुपये जमा हो चुके थे – जिससे पूरे साल की पढ़ाई का
खर्चा निकल सकता था।
मैं वापस इलाहाबाद
पहुँचा। एक कॉल लेटर आया था – बीएचयू (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) से। बीएससी के लिए
प्रवेश परीक्षा दी थी, और मैं उसमें पास हो गया था। यह मेरे जीवन का सपना था – देश
की सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पढ़ाई करना। लेकिन जब मैंने प्रवेश तिथि की जानकारी
ली, तब तक वह तिथि निकल चुकी थी।
यह मेरे जीवन का एक
और टूटा सपना था। मन बहुत व्यथित हुआ। फिर मैंने बीआईटी (Bachelor of Information
Technology) का फॉर्म भरा। प्रवेश परीक्षा पास हो गई। अब दाख़िले के लिए ₹6000 की आवश्यकता
थी।
मैं दो साल बाद गाँव
पहुँचा और पिताजी को सच्चाई बताई। उन्होंने हर संभव प्रयास किया, रिश्तेदारों से लेकर
गाँव के लोगों से मदद माँगी, लेकिन पैसे का इंतज़ाम नहीं हो पाया। केवल एक दिन शेष
था। उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी।
उसी रात 9 बजे अचानक
एक लड़की हमारे घर आई – गाँव के एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार की बेटी, जिसकी उम्र
मेरी ही तरह 18–19 साल रही होगी। उसकी आँखों में कई बार मैंने अपने लिए स्नेह देखा
था, लेकिन उस समय गाँव का माहौल ऐसा था कि हर लड़की को बहन के रूप में ही देखा जाता
था। वह बहुत अच्छे घर से थी, इसलिए कभी संवाद की हिम्मत नहीं हुई।
उसने बिना कुछ कहे
₹2000 दिए और बोली, “पता चला तुम्हें पैसों की ज़रूरत है।” और चली गई।
उसी सहायता के बल
पर मेरा एडमिशन हो गया और मैं बीआईटी की पढ़ाई के लिए लखनऊ आ गया। तीन साल का कोर्स
था। जीवन आसान नहीं था। मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर खर्च निकालता था। संघर्ष जारी
था, लेकिन उम्मीद भी साथ थी।
मेरे दूर के मामा
का लखनऊ में एक छोटा-सा घर था। नीचे का हिस्सा किराये पर था, ऊपर एक कमरा खाली था।
पिताजी ने उनसे बात की, तो मुझे वहाँ रहने की अनुमति मिल गई।
इस नए शहर, नए माहौल
और नए संघर्ष ने मुझे और भी संजीदा बना दिया। मैं अब अपने भविष्य को लेकर अधिक केंद्रित
हो चुका था – और अब मंज़िल मुझे ज्यादा दूर नहीं लग रही थी।
अध्याय 8: संघर्ष, साजिश और दोस्ती की कसौटी
लखनऊ में पढ़ाई शुरू
होने के कुछ ही दिन बाद, मैं अपने दूर के मामा के घर के ऊपरी कमरे में रहने लगा। वहाँ
का वातावरण शुरुआत में शांति भरा था, लेकिन अचानक नीचे के किरायेदार बदल गए और मेरा
जीवन एक बार फिर उथल-पुथल से भर गया।
मेरे मामा का एक महिला
से प्रेम संबंध था, जिनके दो बच्चे थे – एक बेटा और एक बेटी। अब वही लोग नीचे रहने
आ गए थे। लड़का मेरी ही उम्र का था, लेकिन उसकी आंखों में मेरे लिए शुरू से ही विरोध
झलकता था। धीरे-धीरे उसका व्यवहार शत्रुतापूर्ण हो गया।
एक शाम जब मैं पढ़ाई
कर बाहर से लौटा, तो वह लड़का मेरे ही कमरे में घुसने से रोकने लगा। पहले हल्की कहासुनी
हुई, लेकिन बात बढ़ते-बढ़ते हाथापाई तक पहुँच गई। अनजाने में उसे थोड़ी चोट भी लग गई।
वह तुरंत अपने लखनऊ के रिश्तेदारों को बुला लाया।
उन्होंने आते ही मुझे
एक कमरे में बंद कर दिया। मन में डर था, गुस्सा भी था। किसी तरह खिड़की से पड़ोसियों
को आवाज़ लगाई और मदद माँगी। पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस आई और मामले को
रफा-दफा कर दिया। लेकिन मुझे उसी रात 12 बजे वहाँ से कमरा खाली करना पड़ा, क्योंकि
अब वहाँ रहना मेरे लिए सुरक्षित नहीं था।
इस अपमान और असुरक्षा
के बीच, मेरे जीवन का एक और झटका उस समय आया जब मेरे एक घनिष्ठ मित्र ने विश्वासघात
किया। उसका नाम सौरभ था। हमारे बीच गहरी दोस्ती थी और मैं उस पर आँख मूंदकर भरोसा करता
था।
एक दिन हम दोनों हज़रतगंज
गए। मैंने अपनी साइकिल को एक स्टैंड में जमा किया और हम घूमने निकल गए। लेकिन सौरभ
ने बिना बताए साइकिल को वहां से हटाकर किसी और स्टैंड में खड़ा कर दिया। फिर पहले स्टैंड
पर जाकर झूठी शिकायत करने लगा कि साइकिल चोरी हो गई है और वह ₹1000 मुआवज़ा माँगने
लगा।
जब मुझे यह सब समझ
में आया, तब तक देर हो चुकी थी। पुलिस को बुला लिया गया। सौरभ तो मौके से भाग गया,
लेकिन मैं पकड़ा गया। पुलिस ने मुझे धोखाधड़ी के आरोप में हिरासत में ले लिया और मैं
दो दिन थाने में बंद रहा। वहाँ मेरे साथ एक अपराधी जैसा व्यवहार हुआ। पर जब सच्चाई
सामने आई और स्टैंड वालों ने सौरभ को पहचान लिया, तब जाकर मुझे रिहा किया गया।
यह मेरे लिए भावनात्मक
रूप से बहुत बड़ा झटका था। दोस्ती, जिस पर मुझे गर्व था, अब एक घाव बन चुकी थी। लेकिन
इस कठिन समय में मेरी पढ़ाई जारी रही।
इसी दौरान मेरी दोस्ती
हुई तुषार रस्तोगी से – वह होशियार था, एक अच्छे परिवार से आता था और उसके पिता पीसीएस
अधिकारी थे। हमारी दोस्ती गहरी हो गई। हम बीआईटी के तीसरे वर्ष में साथ थे।
एक दिन तुषार को उसके
कुछ पुराने अमीर दोस्तों ने मिलने बुलाया। वह थोड़ा डर रहा था, तो मुझे साथ ले गया।
हम एक मॉल की ऊपरी मंज़िल पर पहुँचे जहाँ वे लोग उसका इंतज़ार कर रहे थे।
जैसे ही तुषार उनके
सामने पहुँचा, उन्होंने उस पर हमला कर दिया। पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब
बीच-बचाव किया तो पता चला कि यह विवाद एक प्रेम प्रसंग को लेकर था। वे लोग तुषार को
ऊपर से नीचे फेंकना चाहते थे।
मैंने जैसे-तैसे तुषार
को बचाया, उसे वहाँ से निकालकर इलाज करवाया। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। उन अमीर लड़कों
ने तुषार को धमकी दी कि वह पाँच दिन में लखनऊ छोड़ दे, नहीं तो अंजाम बुरा होगा। मुझे
भी फोन पर धमकियाँ मिलने लगीं।
डर का माहौल बन गया
था। तुषार ने अपने मौसा, जो दिल्ली में आईएएस अधिकारी थे, से बात की और वहाँ शिफ्ट
होने का निर्णय लिया। उसने मुझसे भी साथ चलने को कहा। मैंने कुछ सोचा नहीं – यह मेरे
लिए भी एक नया मौका था, एक नई शुरुआत।
मैंने अपनी किताबें
और कुछ ज़रूरी सामान समेटा और तुषार के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गया। लखनऊ में जो
कुछ पीछे छूट गया, वो अनुभव, सबक और कुछ टूटे रिश्ते थे – लेकिन दिल्ली में मुझे फिर
से खुद को साबित करने का एक और मौका मिलने वाला था।
अध्याय 9: दिल्ली की गलियों में जीवन का नया पाठ
दिल्ली की हवा में
कुछ अलग ही बात थी — वहाँ की रफ्तार, वहाँ का शोर, वहाँ की भीड़, और हर चेहरे पर अपनी-अपनी
कहानी। मैं और तुषार जब दिल्ली पहुँचे, तो सबसे पहले उनके मौसा श्री आर.के. श्रीवास्तव
के घर गए। वे एक सीनियर आईएएस अधिकारी थे, जिनका सरकारी आवास विशाल और व्यवस्थित था।
पहली बार किसी इतने बड़े घर को अंदर से देखने का अवसर मिला। लेकिन इस आलीशान मकान की
दीवारों के भीतर जो पीड़ा और खामोशी थी, उसने मन को भीतर तक झकझोर दिया।
मौसा जी की बहू ने
आत्महत्या कर ली थी। उनका बेटा मानसिक रूप से अस्थिर था और अब भी उसी घर में रहता था।
उनकी पत्नी पक्षाघात की शिकार होकर वर्षों से बिस्तर पर थीं, जिनकी देखभाल में एक नौकरानी
दिन-रात लगी रहती थी। पूरे घर में एक अजीब सी चुप्पी पसरी रहती थी, जिसे कभी-कभी उनका
छोटा नाती तोड़ता था – वह नन्हा बालक ही उस घर की आखिरी उम्मीद था।
मैंने वहाँ पहली बार
महसूस किया कि पैसा, पद और प्रतिष्ठा होने के बाद भी जीवन में मानसिक शांति और पारिवारिक
सुख की कोई गारंटी नहीं होती। यह परिवार बाहर से जितना संभला हुआ दिखता था, अंदर से
उतना ही टूटा हुआ था। यह अनुभव मेरे लिए जीवन का एक नया पाठ था।
मुझे वह वातावरण असहज
लगने लगा। वहाँ हर चीज़ बहुत औपचारिक थी – हर बात नपी-तुली, हर रिश्ते में दूरी। मैं
अपने खुलेपन और सहजता के साथ वहाँ फिट नहीं हो पा रहा था। मैंने तुषार से बात की कि
मैं कहीं और ठिकाना ढूँढ़ना चाहता हूँ। लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में बिना पहचान के
रहने की जगह मिलना आसान नहीं था।
तभी मेरे मन में एक
विचार आया – सांसदों को मिलने वाले सरकारी आवासों में अक्सर उनके क्षेत्र के लोग रुकते
हैं। मुझे बलिया के प्रसिद्ध नेता जनेश्वर मिश्र की याद आई, जिन्हें 'छोटे लोहिया'
कहा जाता था। लेकिन उस समय सलेमपुर से सांसद हरीकेवल कुशवाहा थे। उनके दिल्ली स्थित
आवास – अतुल ग्रोवर रोड – का पता चल गया।
मैं वहाँ गया तो देखा,
एक बड़ा सा हाल है जहाँ पूर्वांचल से आए लोग ठहरे हुए थे। मैंने भी वहीं रुकने का निश्चय
किया। एक-दो दिन बाद सांसद जी स्वयं वहाँ आए। उनकी उपस्थिति में एक दरबार जैसा माहौल
बन गया। मुझे भी बुलाया गया। वे वृद्ध थे, लेकिन उनकी आँखों में अनुभव की चमक थी। उन्होंने
मुझे इशारे से पास बुलाया और कहा – "बेटा, ज़रा कंधा दबा दो।"
मैंने श्रद्धा से
उनके कंधे दबाए। इसी दौरान उन्होंने मुझसे पूछा, “कहाँ से आए हो, क्या करते हो?” मैंने
अपनी पूरी कहानी सच्चाई के साथ उन्हें सुनाई – गाँव से संघर्ष करते हुए दिल्ली तक पहुँचने
का सफर, और अब ठिकाने की तलाश। उन्होंने थोड़ी देर सोचा, फिर अपने पीए को बुलाकर बोले
– "इस लड़के को पीछे वाला कमरा दे दो।"
कमरा छोटा था, बस
एक आदमी के रहने लायक। लेकिन मेरे लिए वह एक ठोस आधार था – दिल्ली जैसे शहर में सिर
छुपाने की एक सुरक्षित जगह। मैं उनका आभारी था। अब मैं दिल्ली की गलियों में सिर्फ
भटकता नहीं था, अब मेरे पास एक आश्रय था, एक उम्मीद थी।
परंतु, जीवन अभी भी
आसान नहीं होने वाला था...
अध्याय 10: विद्रोह का मूल्य – सत्ता के गलियारों
तीन महीने बीत चुके
थे सांसद निवास में रहते हुए। इन तीन महीनों में मैंने राजनीति के उस नंगे सच को देखा,
जो शायद ही कोई आम नागरिक समझ पाता है। सत्ता के इन गलियारों में एक अलग ही दुनिया
बसती है – जहाँ नैतिकता, रिश्ते और इंसानियत सब कुछ सत्ता की चालों में दबकर दम तोड़
देते हैं।
नेताओं को मैंने बेहद
क़रीब से देखा। बाहर से जो चेहरे जनता की सेवा और सिद्धांतों की बातें करते हैं, वे
भीतर से कितने खोखले होते हैं – यह मैंने अपनी आँखों से देखा। शराब, स्त्रियाँ, पैसों
के लेन-देन और घटिया ज़ुबान – ये सब कुछ आम था, जैसे कि यह राजनीति का हिस्सा हो। मुझे
यह देखकर धक्का लगा कि जिस मंच पर देश की तक़दीर लिखने की बात होती है, वहाँ भीतर से
चरित्र की ऐसी गिरावट है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
मैं चाहता तो सांसद
जी का पीए बन सकता था, उनके करीब रहकर तमाम लाभ ले सकता था – लेकिन मेरा स्वभाव विद्रोही
था। मैं अन्याय, झूठ और समझौते के खिलाफ था। यही मेरी आत्मा की सच्चाई थी – और शायद
यही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
एक दिन सांसद निवास
में होली की पार्टी रखी गई थी। शराब और रंगों का उत्सव चल रहा था। सांसद हरीकेवल कुशवाहा
के बेटे रविंद्र कुशवाहा, जो आगे चलकर दो बार सांसद बने, मुझसे शराब पीने का आग्रह
करने लगे। मैंने मना कर दिया। वे ज़बरदस्ती गिलास थमाने लगे। मैंने झटक दिया और गिलास
गिर गया। बस यही बात उन्हें नागवार गुज़री।
ग़ुस्से में उन्होंने
सबके सामने अपशब्द कहे। मैंने भी जवाब दिया – मैं चुप रहने वालों में से नहीं था। रात
को उन्होंने मुझे डराने और सबक सिखाने की योजना बना ली। लेकिन उनके पिता को किसी तरह
इसकी भनक लग गई। उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और शांत स्वर में कहा, "बेटा,
तुम सही हो, लेकिन यह जगह अब तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है। रात में ही यहाँ से निकल
जाओ।"
मेरे पास एक पुराना
कंप्यूटर और कुछ ज़रूरी सामान था। रात के करीब 12 बजे मैं वहाँ से निकला। यह रात बहुत
लंबी और ठंडी थी, लेकिन मन अंदर से तप रहा था – सत्ता के छल-कपट से सामना करने के बाद
आत्मसम्मान के लिए उठाया गया हर कदम भीतर से मजबूती देता है।
मेरे एक मित्र लक्ष्मी
नगर, यमुना पार में रहते थे। उन्हें फोन किया और रुकने की जगह मांगी। उन्होंने सहर्ष
हामी भर दी। मैं ऑटो से लक्ष्मी नगर पहुँचा और कुछ दिनों के लिए वहाँ टिक गया।
धीरे-धीरे वहीं एक
छोटी सी नौकरी भी मिल गई। काम छोटा था लेकिन आत्मसम्मान से था। अब ज़िंदगी की एक नई
शुरुआत हो चुकी थी। यह शुरुआत पहले से कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन मेरे भीतर
अब एक अनुभव था – नेताओं की असलियत से परिचय और अपने आत्म-सत्य को बचाए रखने की संतुष्टि।
अध्याय 11: सच्चे दोस्त और अधूरी कहानी
जब जीवन हर तरफ से
मुझे घेर चुका था — जेब खाली थी, किराया देने तक के पैसे नहीं थे और मन अकेलेपन से
जूझ रहा था — तभी मेरी ज़िंदगी में एक सच्चा मित्र आया: सोमनाथ। वह बिहार के एक छोटे
से गाँव से था, बेहद सीधा-सादा लेकिन आत्मसम्मान से भरा हुआ। उसकी आँखों में परिवार
के लिए संघर्ष की आग थी, और दिल में दूसरों की मदद करने की भावना।
सोमनाथ के कंधों पर
वृद्ध माता-पिता और एक छोटी बहन की ज़िम्मेदारी थी। उसकी बहन की शादी तय हो चुकी थी,
पर दहेज की मांग के चलते रिश्ता टूट गया था। उसकी यह पीड़ा मुझे अपनी याद दिला गई।
शायद हमारी ज़िंदगियों की समानता ही हमें जोड़ गई — हम दोनों ने दुःखों को झेला था,
और संघर्ष को जीया था।
वह मेरे लिए सिर्फ़
एक दोस्त नहीं, बल्कि एक सहारा बन गया। हम दोनों मिलकर दिल्ली की गलियों में ब्रॉडबैंड
कनेक्शन लगाने का काम करते थे। कभी ₹200, कभी ₹300 — जितना भी मिलता, मिल-बाँट कर खाते।
कई बार तो ऐसा भी होता कि एक वक़्त का खाना एक ही प्लेट में बाँटकर खाते थे।
एक बार, जब मैंने
ज़िक्र किया कि मेरे पास मोबाइल नहीं है और पीसीओ से कॉल करता हूँ, तो सोमनाथ ने अपनी
बचत से मुझे एक मोबाइल गिफ्ट किया। यह मेरे जीवन का पहला मोबाइल था — एक छोटा सा यंत्र,
लेकिन उस समय मेरे लिए सबसे कीमती चीज़। मेरे पास एक लैपटॉप भी था, लेकिन हालात इतने
तंग थे कि एक दिन मजबूरी में मुझे वह भी नेहरू प्लेस के बाज़ार में बेच देना पड़ा।
दुर्भाग्य ऐसा कि
उसी दिन जब मैं लैपटॉप बेचकर लौट रहा था, बस में भीड़ के दौरान वह मोबाइल भी चोरी हो
गया। ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी बार-बार मुझे खाली हाथ करने पर तुली है। लेकिन सोमनाथ जैसा
मित्र हर बार मेरे टूटे हौसलों को जोड़ देता था।
आज जब वह संसद भवन
में कैनोपी विभाग में सरकारी नौकरी में है और मुझे संसद भवन घुमाने ले जाता है, तो
मेरी आँखों में एक गर्व का भाव होता है – क्योंकि सच्चे दोस्त वही होते हैं जो दुःख
में साथ निभाते हैं, न कि केवल सफलता में साथ दिखते हैं।
सच तो यह है कि दोस्त
वही जो समय पर काम आए, बिना स्वार्थ के तुम्हारा हाथ थामे और बिना कहे तुम्हारा दर्द
समझे। सोमनाथ ऐसा ही मित्र था।
इसी दौरान मेरी ज़िंदगी
में एक और रिश्ता पनपने लगा — एक अधूरी लेकिन बेहद गहरी दोस्ती।
मेरे घर के सामने
एक मुस्लिम परिवार रहता था। उस परिवार में मेरी ही उम्र की एक लड़की थी, जो पूरे दिन
बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी और घरेलू ज़िम्मेदारियों में हाथ बंटाती थी। वह बेहद संयमित
और मर्यादित स्वभाव की थी। कभी-कभार शाम को वह छत पर आती, और हमारी निगाहें मिल जातीं।
धीरे-धीरे एक अजीब
सा भाव बनने लगा था — न प्रेम, न मोह — बस एक शांत और सुंदर जुड़ाव।
एक दिन मैंने हिम्मत
कर अपने दोस्त का मोबाइल नंबर एक कागज़ पर लिखकर उसकी छत पर फेंक दिया। उसने वह कागज़
उठाया, पर मैं घबरा गया कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। चार-पाँच दिन बीत गए, कोई फ़ोन नहीं
आया। मैं मान बैठा कि शायद बात यहीं खत्म हो गई।
लेकिन एक रात 10 बजे
फ़ोन आया। उसने कहा, “मैं उसी घर से बोल रही हूँ जहाँ तुमने नंबर फेंका था।” उसकी आवाज़
में कोई डर नहीं था, बस एक सहजता थी जो बहुत अपनेपन भरी थी। उसने कहा, “मुझे तुमसे
नहीं, उस दोस्त से बात करनी है जो तुम्हारे साथ रहता है।”
यह उसकी मासूम चतुराई
थी। फिर बात धीरे-धीरे शुरू हुई। मेरे पास अब मोबाइल था नहीं, इसलिए फिर से पीसीओ से
कॉल करना शुरू किया। हमारी बातचीत सीमित थी लेकिन भावों से भरी होती थी।
उसने एक कंप्यूटर
कोर्स जॉइन कर लिया था, जिससे वह थोड़ी व्यस्त रहने लगी थी। वह कई बार अपनी ट्यूशन
से कमाई गई राशि से मेरी मदद भी करती थी। लेकिन जब भी मैं कुछ लौटाने की बात करता,
वह साफ़ कहती – “अभी तुम्हारी स्थिति ठीक नहीं है, जब हालात अनुकूल हों तब लौटा देना।”
लेकिन किस्मत को यह
संयोग स्वीकार नहीं था। कभी समय नहीं मिला, कभी हिम्मत नहीं हुई — और धीरे-धीरे वह
रिश्ता सहेजकर दिल में रह गया।
मैं जानता था कि हमारी
सीमाएं क्या हैं। पर इस सीमित रिश्ते में भी एक असीम सुकून था। उसके साथ की गई हर बातचीत
मेरे लिए उस वक़्त की सबसे कीमती याद बनती जा रही थी। मैं जानता था कि वह रिश्ता कभी
मंज़िल तक नहीं पहुँचेगा, लेकिन हर रिश्ते की मंज़िल ज़रूरी नहीं — कुछ रिश्ते सिर्फ़
रास्तों में साथ चलने के लिए होते हैं।
उसने मुझे यह सिखाया
कि एक सच्ची मित्रता किसी भी प्रेम से कहीं ज़्यादा पवित्र और मजबूत हो सकती है। ज़रूरी
नहीं कि दोस्त हमेशा लड़का ही हो — कभी-कभी एक लड़की ही तुम्हारी सबसे सच्ची दोस्त
बन जाती है, जो तुम्हारे अंदर की टूटी चीज़ों को बिना सवालों के जोड़ देती है।
सोमनाथ और वह लड़की
— दोनों ही मेरे जीवन के वो अध्याय हैं, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। एक ने साथ
दिया जब पूरी दुनिया ने मुँह मोड़ लिया, और दूसरी ने चुपचाप मेरी भावनाओं को सम्मान
दिया जब मैं खुद को समझ नहीं पा रहा था।
ये दोस्ती अधूरी थी,
लेकिन इसकी खूबसूरती इसी अधूरेपन में थी।
अध्याय 12: ज़िम्मेदारियाँ और नई शुरुआत
समय चुपचाप बहता रहा।
संघर्ष की लहरों के बीच एक और नौकरी मिली – दस हज़ार रुपये मासिक की। यह कोई बड़ी रकम
नहीं थी, लेकिन पिछले हालातों की तुलना में यह किसी संजीवनी से कम नहीं थी। धीरे-धीरे
जीवन की नाव फिर से चलने लगी थी, लेकिन इस बार सामाजिक और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ
मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने लगीं।
घर से लगातार शादी
का दबाव बढ़ रहा था। मेरी उम्र तब 24 वर्ष थी। मेरे ऊपर सिर्फ़ अपने जीवन की नहीं,
बल्कि अपनी छोटी बहन की शादी की ज़िम्मेदारी भी थी। पिता जी ने मेरी शादी तय कर दी।
मेरी इस विषय में विशेष रुचि नहीं थी — न ही लड़की देखने गया, न ही कोई विशेष अपेक्षा
थी। लेकिन जब पिता जी की आंखों में संतोष की झलक देखी, तो चुपचाप स्वीकृति दे दी।
मेरी पत्नी प्रतिमा
यादव, एक संविदा शिक्षिका थीं। उनका स्वभाव शांत, विचार बहुत स्पष्ट और व्यवहार अत्यंत
सहायक था। उनकी उपस्थिति ने मेरे जीवन को स्थिरता दी। शादी में ससुराल पक्ष की ओर से
कुछ धन मिला, जिससे पिता जी ने घर की मरम्मत करवाई और विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ।
अब हमारे जीवन में आवश्यकताओं की बुनियादी चीजें थीं — सम्मान, समझौता और साथ।
शादी के तीन वर्षों
के भीतर मेरी बहन की शादी की तारीख भी तय हो गई। संयोग ऐसा कि उसी समय मेरी नौकरी चली
गई। एक ओर शादी का आयोजन, दूसरी ओर बेरोजगारी — लेकिन मैं टूटा नहीं। दो महीने तक कठिन
संघर्ष किया और फिर गुरुग्राम की एक फैशन इंडस्ट्री में सॉफ्टवेयर डेवेलपर के रूप में
नौकरी मिल गई। यह मेरी मेहनत की जीत थी।
उसी दौरान, 26 फरवरी
2010 को मेरी पुत्री का जन्म हुआ। वह दिन मेरे जीवन की सबसे बड़ी खुशी में से एक था।
एक छोटी सी जान ने मेरे जीवन को जैसे रंगों से भर दिया था। उसका नन्हा मुस्कुराता चेहरा,
पहली बार उसकी उंगली पकड़ना, और उसकी पहली आवाज — इन सबने मेरी थकी हुई आत्मा को ऊर्जा
से भर दिया। एक पिता बनना मुझे भावनात्मक रूप से नया बना गया।
हालाँकि, मेरे और
प्रतिमा के बीच एक दूरी बनी रही — मैं गुरुग्राम में था, वह गाँव में नौकरी कर रही
थीं। यह भौगोलिक दूरी मन के भीतर भी असर करने लगी थी। मैं चाहता था कि वह नौकरी छोड़कर
मेरे साथ रहे, लेकिन उनके करियर की समझदारी और परिवार की ज़रूरतों को देखकर मैंने हमेशा
अपने मन को समझा लिया। यह भी एक तरह का प्रेम था — जिसमें त्याग शामिल था।
बहन की शादी मैंने
यथासंभव अच्छे स्तर पर की। जितना कमाता था, उससे कहीं अधिक खर्च किया। फलस्वरूप दो
लाख रुपये तक का कर्ज हो गया। और दुःख की बात यह रही कि इतना सब करने के बाद भी परिवार
से वह सम्मान और संतोष नहीं मिला जिसकी मुझे आशा थी। माता-पिता और बहनों को लगता था
कि मैं केवल परिवार के लिए ही कमाऊँ, मेरे कोई निजी सपने नहीं होने चाहिए।
बहन की शादी के दिन
नज़दीक आते जा रहे थे और पैसों का संकट गहराता जा रहा था। किसी से माँगने की हिम्मत
नहीं थी, कर्ज़ पहले ही सिर पर था। ऐसे में मैंने वो किया जो शायद कोई भी बेटा अपनी
बहन के लिए करता – ससुराल से विवाह के समय उपहार में मिली सोने की चेन चुपचाप गाँव
के एक छोटे कस्बे के ज्वेलर को बेच दी। उस समय मन भारी था, लेकिन आत्मा संतुष्ट थी
– क्योंकि वो चेन मेरी बहन की विदाई के लिए काम आ रही थी।
इस बात की जानकारी
मैंने परिवार में किसी को नहीं दी। न तो पिता जी को, न पत्नी को, न बहन को। यह मेरा
एक मौन योगदान था, जिसे मैंने दिल में ही रख लिया।
ज़िंदगी में कभी-कभी
त्याग को दिखाया नहीं जाता, सिर्फ़ जिया जाता है।
लेकिन मैं चाहता था
कि जीवन में कुछ अपने लिए भी करूँ। मैंने धीरे-धीरे बचत शुरू की। इसी बीच एक और दुखद
समाचार आया — मेरी बड़ी बहन के पति की अचानक मृत्यु हो गई। पूरा परिवार दुख में डूब
गया। मैंने आगे बढ़कर हर संभव सहायता की।
इसी घटना ने पिता
जी को मानसिक रूप से बहुत व्यथित कर दिया और 2013 में उन्हें हार्ट अटैक आया। मुझे
जब गुरुग्राम में इसकी सूचना मिली, तो मैं तुरंत बनारस भागा और उन्हें हार्ट हॉस्पिटल
में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने बायपास सर्जरी के लिए तीन लाख रुपये का खर्च बताया।
वह वक्त ऐसा था कि बहन की शादी का कर्ज अभी उतरा नहीं था, फिर भी मैंने बैंक से लोन
लेकर पिता जी की सर्जरी करवाई। यह मैंने चुपचाप किया — परिवार में किसी को नहीं बताया।
लेकिन कुछ समय बाद लोगों को यह भ्रम हो गया कि मैं बहुत पैसा कमाता हूँ, इसलिए अपेक्षाएं
और नाराज़गियाँ दोनों बढ़ती गईं।
फिर एक बार किस्मत
ने मुस्कुराया और 2012 में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्री के बाद पुत्र के आने
से घर की खुशियाँ और बढ़ गईं। जिस दिन मैं बेटे को पहली बार गोद में लिया, उस दिन मेरे
जीवन का सबसे बड़ा एहसास हुआ — पूर्णता का। अब मैं सिर्फ़ बेटा, पति या भाई नहीं रहा
— अब मैं एक पिता था जिसकी दोनों हथेलियों में भविष्य की दो कोमल उंगलियाँ थीं।
बेटी और बेटे — दोनों
ने मेरे जीवन को संतुलन दिया। बेटी ने मुझे संवेदनशील बनाया, और बेटे ने मुझे साहसी।
एक ने मुझे सिखाया कैसे भावनाएँ संजोनी हैं, और दूसरे ने सिखाया कैसे ज़िम्मेदारियाँ
निभानी हैं।
एक वर्ष के भीतर कर्ज
धीरे-धीरे चुका दिया। फिर मैंने और प्रतिमा ने मिलकर एक सपना देखा — अपना एक घर। कुछ
पैसा जोड़कर, थोड़ा और लोन लेकर और प्रतिमा के सहयोग से 2015 में लखनऊ में पहला प्लॉट
खरीदा। यह मेरी मेहनत, हमारे संघर्ष और एक संयुक्त सपने की पहली ईंट थी।
अध्याय 13: लखनऊ – सपनों का घर और टूटती उम्मीदें
लखनऊ, वह शहर जहाँ
मैंने युवावस्था की पढ़ाई की थी, और जहाँ की गलियों में मेरे संघर्ष और सपनों की पहली
सांसें बसी थीं। दिल्ली, गुरुग्राम और इलाहाबाद जैसे शहरों में भटकने के बाद भी, लखनऊ
का आकर्षण कभी कम नहीं हुआ। यह शहर मेरे लिए सिर्फ़ एक जगह नहीं, एक सपना था – एक ऐसा
सपना जिसमें अपने परिवार को सुरक्षित, सम्मानजनक और स्नेहभरे माहौल में रखना चाहता
था।
2017 में, एक पुराने
मित्र के सहयोग से गोमती नगर एक्सटेंशन में एक और प्लॉट खरीदा। मेरी पत्नी प्रतिमा
का सहयोग अद्वितीय था। वह अब एक प्राइमरी स्कूल में स्थायी शिक्षक बन चुकी थीं। अखिलेश
यादव जी की सरकार में जब सभी संविदा शिक्षकों को स्थायी किया गया, तब हमारे जीवन की
स्थिरता एक नये दौर में प्रवेश कर चुकी थी। घर की छोटी-बड़ी ज़रूरतें अब खुद ब खुद
पूरी होने लगी थीं।
सपनों को आकार मिल
रहा था। 2019 में लखनऊ में अपने घर की नींव रखी। मैंने संकल्प लिया था कि मेरे बच्चों
को वह सब मिलेगा जो मुझे नहीं मिल सका – एक अच्छा घर, बेहतर शिक्षा, और सुरक्षित जीवन।
दो वर्षों की कड़ी मेहनत, लगातार पैसों की जुगाड़, कर्ज और दिन-रात के श्रम से वह घर
खड़ा हुआ – जिसकी दीवारों में मेरी तपस्या और छत पर मेरे सपनों की धूप थी।
लेकिन तभी समय ने
करवट ली। 2017 में उत्तर प्रदेश की सरकार बदल गई। भाजपा की सरकार आई और शिक्षकों की
स्थायित्व नीति पर पुनर्विचार शुरू हुआ। पत्नी को दोबारा संविदा पर कर दिया गया। मैंने
उनसे नौकरी छोड़ने को कहा, क्योंकि अब घर लखनऊ में था और बच्चे स्कूल जा रहे थे। प्रतिमा
ने बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दी और अपनी नौकरी छोड़ दी। यह उनका सबसे बड़ा त्याग
था।
बच्चे अब लखनऊ के
प्रसिद्ध विद्यालय – Seth M.R. Jaipuria School – में पढ़ते हैं। पढ़ाई में होशियार
हैं और व्यवहार में विनम्र। मुझे गर्व होता है कि वो हर चीज़ से ज़्यादा इंसानियत को
समझते हैं।
लेकिन जीवन हमेशा
सरल नहीं होता। नौकरी करते हुए मैंने एक सपना देखा – खुद का व्यवसाय। मैंने लखनऊ में
एक मेडिकल स्टोर खोला। शुरुआत उत्साहजनक थी। परंतु चूंकि मैं खुद नौकरी में व्यस्त
रहता था, तो मैंने स्टोर की ज़िम्मेदारी एक ऐसे युवक को सौंप दी, जिस पर मुझे बहुत
विश्वास था। वह लड़का मेरे भरोसे पर खरा नहीं उतरा। धीरे-धीरे उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध
लगने लगीं – स्टॉक कम होना, बिक्री का हिसाब मेल न खाना, ग्राहकों की शिकायतें आना।
एक दिन जब मैंने अचानक
स्टोर का निरीक्षण किया, तो सारी सच्चाई सामने आई। उसने न केवल पैसे का गबन किया था,
बल्कि जानबूझकर ग्राहकों के साथ भी बेईमानी कर रहा था। जब मैंने उससे जवाब माँगा, तो
वह गायब हो गया। उस घटना ने मुझे जीवन का एक बड़ा पाठ सिखाया – “हर मुस्कुराता चेहरा
विश्वास के योग्य नहीं होता।”
इस धोखे ने न केवल
मेरे व्यापार को नुकसान पहुँचाया, बल्कि मानसिक रूप से भी मुझे झकझोर दिया। काफी धन
डूब गया। मन में निराशा हुई, आत्मविश्वास डगमगाया, लेकिन जीवन ने सिखाया था कि ठहरना
नहीं है।
आज मेरे पास एक अच्छा
घर है, गाड़ी है, 2–3 प्लॉट हैं, कुछ बचत भी है – और सबसे अहम, एक ऐसा परिवार है जो
सुख-दुख में मेरे साथ खड़ा है। मैं एक मध्यमवर्गीय जीवन के सभी मानकों पर खरा उतर चुका
हूँ। लेकिन फिर भी… मन कहीं अधूरा है।
क्योंकि इच्छाओं की
कोई सीमा नहीं होती। इंसान को जो मिल जाता है, वह सामान्य हो जाता है – और जो नहीं
मिलता, उसके पीछे वो ताउम्र भागता रहता है। यह दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती – हर मंज़िल
के बाद एक नई शुरुआत होती है।
अब भी मैं गुरुग्राम
में नौकरी करता हूँ, बच्चों से दूर, परिवार से दूर – वैसा ही जैसे पहले था। जीवन की
भागदौड़ में दोस्त भी नहीं बना पाया। शायद समय ही नहीं मिला, या स्वभाव ऐसा था कि हर
किसी से जुड़ना नहीं आया। मेरा स्वभाव थोड़ा विद्रोही रहा – न तो किसी का बुरा किया,
न ही किसी के आगे झुका। जो सत्य लगा, उसे स्वीकार किया। बाकी, न झूठ बोला, न दिखावा
किया।
मैंने अपने रिश्तेदारों
और परिचितों की यथासंभव मदद की, लेकिन शायद लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।
कोई खुश नहीं हुआ, क्योंकि मैं वो नहीं कर पाया जो वो चाहते थे – पर जो कर सकता था,
वह पूरे मन से किया।
समय के साथ सोच भी
बदली। ओशो, गाँधी, बुद्ध और अंबेडकर को पढ़ा – और जब पढ़ने की गहराई आई, तो बोलना कम
हो गया। पहले हर विषय पर अपनी राय देता था, अब दूसरों की राय को सुनता हूँ। शायद यही
परिपक्वता है।
आज मेरी उम्र 41 वर्ष
है। इस आत्मकथा को लिखने का उद्देश्य किसी को दिखाना या जताना नहीं है – यह मेरी आत्मा
का संवाद है मेरे ही अंतर्मन से। मैंने अब तक जीवन सिर्फ़ अपने लिए जिया है, लेकिन
आने वाले वर्षों में चाहूँगा कि कुछ समाज और आत्म-संतोष के लिए कर सकूँ।
यह कहानी यहीं खत्म
नहीं होती – बल्कि यहीं से शायद एक नई शुरुआत होती है…
अध्याय 14: आत्म-संतोष की ओर – जीवन का सार
अब जब जीवन की बहुत
सी परीक्षाएँ दे चुका हूँ – संघर्ष, सफलता, विफलता, रिश्ते, अकेलापन, मोह और मोहभंग
– तो एक बात बहुत गहराई से समझ में आई है: पैसा, पढ़ाई और प्रतिष्ठा ज़रूरी हैं, लेकिन
ये जीवन को पूर्ण नहीं बनाते।
बहुत लोगों को देखा
– जिनके पास सब कुछ था, फिर भी भीतर से खाली थे। जितना वे पाते गए, उतना ही बेचैन होते
गए। जिनके पास अधिक था, वे भीतर से अधिक टूटे मिले। मैंने भी जब थोड़ा-बहुत पाया तो
समाज ने चाहा कि मैं और दौड़ूं – लेकिन उस दौड़ में मुझे अपना सुकून खोता दिखा।
एक समय ऐसा आया जब
लगा – अब और पाने की दौड़ व्यर्थ है। जो है, उसमें ही रुक जाओ, ठहर जाओ। वहीं एक आंतरिक
शांति की शुरुआत हुई।
सच्चा सुकून कहीं
बाहर नहीं है – न धन में, न पद में, न प्रतिष्ठा में। सुकून तो भीतर है। जब मन स्थिर
होता है, तो बाहर का शोर भी सुंदर लगने लगता है। और जब भीतर बेचैनी हो, तो लाख शांति
का दिखावा किया जाए – असल में अशांति ही जीवन को घेरे रहती है।
मैंने महसूस किया
कि सच्ची विजय वह है, जब तुम स्वयं को जीत लो। जब तुम यह स्वीकार कर लो कि 'अब जो है,
वही काफी है' – वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है – आध्यात्म की यात्रा, आत्म-साक्षात्कार
की यात्रा।
अब मैं भागना नहीं
चाहता। अब मुझे दुनिया को कुछ साबित नहीं करना। जो हूँ, जैसा हूँ, बस उसे पूरी ईमानदारी
से जीना चाहता हूँ। जो समय बचा है, उसे आत्म-संतोष और सेवा में लगाना चाहता हूँ।
अब मेरा प्रयास है
– स्वयं के भीतर स्थिर होना। जिस समाज ने मुझे संघर्षों से जूझते देखा, अब उसी समाज
में कुछ सकारात्मक ऊर्जा बाँट सकूं – यही मेरी अंतिम आकांक्षा है।
अब मेरा सपना है
– कुछ ऐसा कर सकूँ जिससे मेरे जैसे और भी लोग प्रेरित हो सकें। शायद एक स्कूल खोलूं,
या एक ट्रस्ट बनाऊँ – जहाँ गाँव के बच्चे किताबों को सिर्फ़ देख न सकें, बल्कि उन्हें
पढ़ सकें, समझ सकें, और अपने सपनों की उड़ान भर सकें।
मुझे अब यह बात गहराई
से समझ आ चुकी है:
"जिन्होंने जीवन
में कुछ खोया नहीं, उन्होंने पाया भी कुछ नहीं।"
और एक और बात:
"सच्चा सुख दूसरों
के चेहरे पर मुस्कान देखकर आता है, न कि खुद के बटुए में पैसे गिनकर।"मैं अब भी
गुरुग्राम में नौकरी कर रहा हूँ – बच्चों से दूर, पत्नी से दूर, लेकिन एक नई उम्मीद
के साथ – कि अगले 25 वर्षों में मैं वही करूंगा जो मेरे आत्मसम्मान और समाज को ज़रूरत
है।
यह आत्मकथा मेरे जीवन
की परछाई है – पूरी तरह सच्ची, बिना किसी दिखावे या बनावट के। अगर इस लेखनी से किसी
एक व्यक्ति को भी प्रेरणा मिले, तो समझूंगा कि मेरी ज़िंदगी सफल रही।
धन्यवाद।
Tagline:
"हर इंसान की सफलता का पैमाना एक कुर्सी
नहीं होता, कभी-कभी वो रोटी और सम्मान भी होता है।"
“लोग पूछते हैं – क्या बना तू?
मैं मुस्कुराता हूं – बेटा डॉक्टर बन रहा है, बेटी स्कूल में अव्वल है, बीवी मुस्कुरा
कर रोटी देती है…
मैं खुद कुछ न बना… लेकिन सबको बना दिया।”
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पुस्तक का नाम: माटी
से मंज़िल तक
लेखक: हरिन्द्र यादव
"हर संघर्ष एक
बीज है, जो समय आने पर सफलता का वृक्ष बनता है।"
पुस्तक के बारे में:
"माटी से मंज़िल तक" एक सच्ची आत्मकथा है जो जीवन के सबसे गहरे अंधेरों
से उजाले की ओर बढ़ने की यात्रा को उजागर करती है। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के छोटे
से गांव 'चरौवा' में जन्मे हरिन्द्र यादव की, जिन्होंने भूख, गरीबी, संघर्ष और रिश्तों
की उलझनों के बीच, अपने आत्मबल और अडिग संकल्प से जीवन में एक सार्थक मुकाम पाया।
यह पुस्तक सिर्फ़
एक व्यक्ति की आत्मकथा नहीं, बल्कि लाखों भारतीयों की आवाज़ है – जो सीमित संसाधनों
में भी असीम सपने देखते हैं। हरिन्द्र जी की यात्रा दिल्ली, इलाहाबाद, गुरुग्राम और
लखनऊ होते हुए आत्म-साक्षात्कार तक पहुँचती है।
लेखक के बारे में:
हरिन्द्र यादव एक अनुभवी सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं, जिनका जीवन एक साधारण किसान परिवार
से शुरू होकर बड़े शहरों की चकाचौंध और अनुभवों से गुज़रता है। वे न केवल एक जिम्मेदार
पिता, समर्पित पति और आदर्श पुत्र हैं, बल्कि समाज और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत
भी हैं।
यह पुस्तक उनके लिए
है:
- जो जीवन से थक गए हैं, लेकिन हार मानना नहीं
चाहते।
- जो संघर्ष को कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाना
चाहते हैं।
- जो सच्चे जीवन अनुभवों से प्रेरणा पाना चाहते
हैं।
📚 यह आत्मकथा एक दर्पण है – जिसमें आप खुद को देख
पाएंगे।
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