संवेदनाओं का पतन : भीड़, पाखंड और खोती इंसानियत का समय
✍️ लेखक : हरिन्द्र यादव
📍 स्थान : लखनऊ
📅 तिथि : 20 जनवरी 2026
आज का समय सिर्फ कठिन नहीं है, यह समय चेतावनी दे रहा है, यह समय आईना दिखा रहा है, यह समय पूछ रहा है कि क्या हम सच में सभ्य कहलाने के योग्य रह गए हैं, जब चारों ओर धर्म के नाम पर विभाजन, जाति के नाम पर नफ़रत, और आधुनिकता के नाम पर संवेदनहीनता खुलेआम नाच रही है, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि इंसान आखिर किस दिशा में जा रहा है।
हमने पढ़ाई को प्रगति का मापदंड बना लिया था, लेकिन आज पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास में गले तक डूबे दिखाई देते हैं, विज्ञान की बात करने वाले लोग भी चमत्कारों के पीछे भागते नज़र आते हैं, तर्क और विवेक को हमने किताबों में बंद कर दिया है और जीवन को अफवाहों, रीलों और भीड़ के हवाले कर दिया है। धर्म जो कभी इंसान को इंसान से जोड़ने का माध्यम था, आज वही धर्म सत्ता, स्वार्थ और पाखंड का औज़ार बनता जा रहा है, जगह-जगह तथाकथित धार्मिक आयोजनों में अव्यवस्थित भीड़, अंधी श्रद्धा और अविवेक के कारण लोग कुचले जा रहे हैं, मर रहे हैं, और विडंबना यह है कि मौत के बाद भी हम सवाल नहीं पूछते, बल्कि अगले आयोजन की तैयारी में जुट जाते हैं।
पाखंडी बाबाओं, ढोंगी कथावाचकों और नकली संतों की फौज खड़ी हो चुकी है, जो धर्म नहीं बेच रहे, बल्कि लोगों की आशंकाओं, डर और अज्ञान का व्यापार कर रहे हैं, और समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग भी तालियाँ बजाकर इस व्यापार का हिस्सा बन रहा है।
इससे भी अधिक भयावह तस्वीर तब सामने आती है जब हम देखते हैं कि इंसानियत, जो किसी भी समाज की आत्मा होती है, धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। हाल के दिनों की घटनाएँ मन को झकझोर देती हैं, नोएडा में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर सड़क पर मदद के लिए गुहार लगाता रहा, उसकी आवाज़ ट्रैफिक के शोर में नहीं, बल्कि हमारी मरी हुई संवेदनाओं में दब गई, लोग आगे बढ़ते रहे, गाड़ियाँ रुकती रहीं, लेकिन इंसान नहीं रुका, कोई हाथ मदद के लिए नहीं बढ़ा, शायद इसलिए नहीं कि लोग असमर्थ थे, बल्कि इसलिए कि लोगों को फर्क ही नहीं पड़ा।
एक और घटना में मछलियों से भरा टैंकर एक बच्चे को कुचल देता है, बच्चा बुरी तरह घायल होता है, दर्द से तड़प रहा होता है, और आसपास मौजूद लोग एंबुलेंस बुलाने, बच्चे को अस्पताल पहुँचाने या टैंकर चालक को रोकने के बजाय सड़क पर गिरी मछलियाँ बटोरने लगते हैं, कोई वीडियो बना रहा है, कोई रील शूट कर रहा है, कोई व्यूज की गिनती में व्यस्त है, मानो सामने इंसान नहीं, कोई दृश्य मात्र पड़ा हो। यह दृश्य सिर्फ उस बच्चे की पीड़ा नहीं दिखाता, यह हमारे समाज की नैतिक मृत्यु की घोषणा करता है। सोशल मीडिया ने हमें जो ताकत दी थी, वह थी आवाज़ उठाने की, अन्याय दिखाने की, मदद पहुँचाने की, लेकिन हमने उस ताकत को तमाशे में बदल दिया है, आज किसी की मौत ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं होती, बल्कि कंटेंट होती है, किसी की चीख मदद की पुकार नहीं, बल्कि बैकग्राउंड साउंड बन जाती है, और हम सब दर्शक बनकर स्क्रीन के उस पार खड़े रहते हैं, सुरक्षित, निश्चिंत और संवेदनहीन।
हर व्यक्ति यह सोचकर खुद को समझा लेता है कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में अगर किसी एक-दो के साथ कुछ हो भी गया तो क्या फर्क पड़ता है, यह सोच धीरे-धीरे हमारे भीतर बैठ जाती है और हमें यह एहसास भी नहीं होता कि जब हम ऐसा सोचते हैं, तब हम खुद को भी उसी भीड़ में शामिल कर लेते हैं, जो किसी दिन हमारे गिरने पर भी यही कहेगी कि क्या फर्क पड़ता है।
धर्म, जाति, भाषा और पहचान की दीवारें इतनी ऊँची हो चुकी हैं कि उनके पीछे इंसान दिखाई ही नहीं देता, हम पहले यह पूछते हैं कि वह किस धर्म का है, किस जाति का है, किस पार्टी को मानता है, उसके बाद तय करते हैं कि उसकी मदद करनी है या नहीं, और कई बार तो यह निर्णय भीड़ के हाथ में छोड़ दिया जाता है। पाखंडवाद इसीलिए फल-फूल रहा है क्योंकि सवाल पूछने की आदत खत्म होती जा रही है, लोग तर्क से नहीं, ट्रेंड से चलते हैं, जो चल रहा है वही सही है, जो भीड़ कह रही है वही सच है, और जो अलग सोचता है वह या तो देशद्रोही कहलाता है या धर्मद्रोही। हम यह भूल गए हैं कि समाज की असली मजबूती मंदिरों, मस्जिदों या मंचों से नहीं, बल्कि सड़क पर गिरते हुए इंसान को उठाने से मापी जाती है, किसी घायल को पानी पिलाने से मापी जाती है, बिना कैमरा ऑन किए किसी की मदद करने से मापी जाती है।
आज संवेदना दिखाना भी एक प्रदर्शन बन गया है, पहले मदद, फिर फोटो, फिर पोस्ट, फिर लाइक और कमेंट, और अगर कैमरा नहीं है तो मदद का अर्थ भी नहीं रह जाता। यह समय इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह हमें धीरे-धीरे बुरा नहीं बना रहा, बल्कि हमें उदासीन बना रहा है, और उदासीन समाज किसी भी क्रूरता को चुपचाप स्वीकार कर लेता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज ने आंखें मूंदी हैं, तब-तब हिंसा, अन्याय और अमानवीयता ने राज किया है। आज जरूरत इस बात की है कि हम खुद से सवाल पूछें, क्या हम वही समाज बनना चाहते हैं जहाँ सड़क पर पड़ा इंसान वीडियो बन जाता है, जहाँ धर्म आयोजन में मरने वालों की लाशें अगले पोस्टर से ढक दी जाती हैं, जहाँ बच्चे की चीख मछलियों की कीमत से सस्ती हो जाती है, जहाँ मदद करने वाला नहीं, देखने वाला हीरो बन जाता है।
यह लेख किसी एक धर्म, जाति या वर्ग पर आरोप नहीं है, यह हम सबके लिए आईना है, क्योंकि भीड़ में खड़े हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है, और जब हम जिम्मेदारी से भागते हैं, तब हम भी अपराध के हिस्सेदार बन जाते हैं। अभी भी समय है, अगर हम चाहें तो रुक सकते हैं, झुक सकते हैं, हाथ बढ़ा सकते हैं, फोन जेब में रख सकते हैं, और इंसान को इंसान की तरह देख सकते हैं। इंसानियत कोई बड़ा आंदोलन नहीं है, यह छोटे-छोटे फैसलों से जिंदा रहती है, सड़क पर रुकने के फैसले से, सवाल पूछने के फैसले से, भीड़ के खिलाफ खड़े होने के साहस से। अगर आज हम नहीं जागे, तो कल जब हमारी बारी आएगी, तब शायद कोई कैमरा तो होगा, लेकिन कोई हाथ नहीं।

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