Saturday, 10 January 2026

“मुलायम सबके थे – अखिलेश सबके हैं”

 “मुलायम सबके थे – अखिलेश सबके हैं”


“मुलायम ने जाति नहीं देखी—हाल देखा, हालात देखे। अखिलेश जाति नहीं देखते—भविष्य देखते हैं।”
“मुलायम सिंह ने संघर्ष दिया, अखिलेश यादव ने दिशा दी।”
“मुलायम ने आवाज़ उठाई, अखिलेश उसे आगे बढ़ा रहे हैं।”
“यह सिर्फ नारा नहीं—यह यूपी के भरोसे की जंजीर है।”

उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव नजदीक आता जा रहा है और पूरा राजनीतिक माहौल उसी दिशा में मुड़ चुका है। इस बार मुकाबला साफ-साफ भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच दिखाई दे रहा है, और खास बात यह है कि समाजवादी पार्टी के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसा महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा। राजनीति में हमेशा नैरेटिव की लड़ाई सबसे बड़ी लड़ाई होती है और बीजेपी इसमें हमेशा से माहिर रही है—बिहार में जंगलराज का नैरेटिव बनाया, यूपी में गुंडाराज का नैरेटिव खड़ा किया, लेकिन अब समाजवादी पार्टी को भी एक ऐसा ही मजबूत और भावनात्मक नैरेटिव चाहिए जो जनता के दिल तक जाए, लोगों को मुलायम सिंह यादव की सादगी, नेतृत्व और सर्वजन कल्याण की राजनीति याद दिलाए, और अखिलेश यादव की नई पीढ़ी की राजनीतिक सोच को ताकत दे।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का नाम सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे माली के रूप में लिया जाता है जिसने जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र सबको एक साथ जोड़कर एक ऐसा सामाजिक-राजनीतिक गुलदस्ता तैयार किया जिसकी सुगंध आज भी यूपी की मिट्टी में मौजूद है। यह सच है कि राजनीति में जातियों का संतुलन सबसे कठिन काम होता है, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने इसे सिर्फ संतुलित नहीं रखा, बल्कि हर जाति को सम्मान, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व देकर समाजवादी आंदोलन को असली “जनता का आंदोलन” बनाया। ठाकुर समाज के बड़े-बड़े नेता मुलायम सिंह के भरोसे पर खड़े हुए—अमर सिंह भले ही ठाकुरों से जुड़े हों, लेकिन वे मुलायम सिंह की राजनीति में ताकतवर रणनीतिकार बने; मोहन सिंह जैसे तेजतर्रार समाजवादी नेता भी ठाकुर थे; राजा भैया जैसे लोकप्रिय क्षत्रिय नेता को भी सबसे ज्यादा राजनीतिक स्पेस मुलायम सिंह ने ही दिया; बृजभूषण शरण सिंह जैसे बड़े प्रभाव वाले ठाकुर नेता मुलायम सिंह की राजनीतिक संरचना में मजबूत स्तंभ बने। ब्राह्मण समाज को भी मुलायम सिंह यादव ने वह सम्मान दिया जो शायद ही किसी ओबीसी नेता ने दिया हो—जनश्वर मिश्र, जिन्हें समाजवादी विचारधारा का महर्षि कहा जाता है, मुलायम सिंह के सबसे करीबी सलाहकारों में से रहे; माता प्रसाद पांडे जैसे ईमानदार और सादगी वाले नेता को विधान सभा अध्यक्ष जैसे बड़े पद पर पहुँचाया; राजेंद्र त्रिपाठी, रामकृष्ण द्विवेदी और अनगिनत ब्राह्मण नेता सपा की राजनीति के मुख्य चेहरे बने। कुर्मी समाज जो यूपी की राजनीति का मजबूत आधार है, उसे भी मुलायम सिंह ने कभी हाशिये पर नहीं रखा—बेनी प्रसाद वर्मा न सिर्फ उनके साथी थे बल्कि समाजवादी आंदोलन के तीन मूल स्तंभों में गिने जाते हैं; राजाराम यादव के साथ-साथ दर्जनों कुर्मी नेता, विधायक और मंत्री मुलायम सिंह के दौर में उभरे। दलित समाज की बात करें तो मुलायम सिंह ने यहां भी असाधारण उदाहरण पेश किया—कांशीराम जैसे दिग्गज नेता के साथ मिलकर सरकार बनाना उस दौर में एक अद्भुत राजनीतिक प्रयोग था, क्योंकि यह वही समय था जब ओबीसी और दलित राजनीति में टकराव चरम पर था; इसके बावजूद मुलायम सिंह ने ना सिर्फ यह गठबंधन बनाया बल्कि दर्जनों दलित नेताओं जैसे दोस्त मोहम्मद, रामचरन, राजाराम को आगे बढ़ाया और कई दलित जिलाध्यक्षों को प्रदेश में मजबूत जगह दी। मुस्लिम समाज के लिए तो मुलायम सिंह एक सुरक्षा कवच जैसा नाम थे, और यह बात आज भी यूपी के घर-घर में मानी जाती है—आजम खान, अहमद हसन, इरफान सोलंकी, रिजवान अहमद, अनेकों मुसलमान नेता मुलायम सिंह की राजनीति में चमके; हजारों मुस्लिम कार्यकर्ता समाजवादी पार्टी की रीढ़ बने। यादव समाज तो मुलायम सिंह की राजनीतिक शक्ति का मूल आधार था ही, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि मुलायम सिंह ने कभी यादववाद की राजनीति नहीं की—उन्होंने यादवों को महत्व दिया, लेकिन अन्य सभी पिछड़ी जातियों को उतना ही प्रतिनिधित्व दिया, जैसे—कश्यप, निषाद, प्रजापति, मौर्य, शाक्य, कुशवाहा, लोध, गडरिया, तेली, सैनी, बिंद, पाल, सभी को संगठन में मजबूत जगह दी; यही वजह है कि 90 के दशक से लेकर 2012 तक समाजवादी पार्टी एक असली पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक गठबंधन बनकर उभरी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुलायम सिंह यादव ने कभी ऊँच-नीच नहीं देखा—उन्होंने राजपूत, ब्राह्मण और दलित को एक ही पंक्ति में खड़ा किया और हमेशा कहा कि समाजवादी राजनीति जातियों का नहीं, समाज का आंदोलन है। किसानों और नौजवानों को उन्होंने सबसे आगे रखा, क्योंकि वे खुद किसान परिवार से थे और जमीन की तकलीफ को समझते थे। यही कारण है कि मुलायम सिंह का बनाया यह “जातीय गुलदस्ता” सिर्फ एक चुनावी जोड़ नहीं था, बल्कि एक सामाजिक संरचना थी जिसमें हर रंग की पंखुड़ी शामिल थी—ठाकुरों से लेकर ब्राह्मणों तक, ब्राह्मणों से लेकर कुर्मियों तक, कुर्मियों से लेकर दलितों तक, दलितों से लेकर मुसलमानों तक, मुसलमानों से लेकर हर पिछड़ी जाति तक—सब मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक बगीचे का हिस्सा थे। 

 यही नहीं, मुलायम सिंह ने हमेशा किसानों और नौजवानों को पहली प्राथमिकता दी—इसलिए उन्हें धरती पुत्र कहा गया, क्योंकि वे जमीन से उठे और जमीन से जुड़े रहे। ऐसे नेता कम होते हैं जिनके बारे में विरोधी भी सम्मान से बात करें, लेकिन मुलायम सिंह यादव उन चंद नेताओं में से एक थे। बीजेपी चाहे जितना भी गुंडाराज का नैरेटिव बनाए, वास्तविकता यह है कि मुलायम सिंह एक समावेशी नेता थे जिनकी राजनीति का केंद्र ‘सबको साथ लेकर चलना’ था। आज जब राजनीति बदल रही है और नए मुद्दे जन्म ले रहे हैं, तो समाजवादी पार्टी को भी एक ऐसा नारा चाहिए जो सीधे जनता के दिल को छूए, घर-घर पहुंचे, और सपा की असली पहचान को सामने लाए। 

यही कारण है कि—“मुलायम सबके थे, अखिलेश सबके हैं”—यह नारा सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि समाजवादी आंदोलन का सार है। मुलायम सिंह की राजनीति जहाँ सामाजिक न्याय, जातीय संतुलन और सर्वसमावेशिता से बनी थी, वहीं अखिलेश यादव की राजनीति आधुनिकता, विकास, तकनीक, शिक्षा, सड़क, एक्सप्रेसवे, रोजगार और युवा नेतृत्व की नई पहचान बनी है। अगर मुलायम सिंह ने हर समाज को हाथ पकड़कर आगे बढ़ाया तो अखिलेश यादव हर समाज को जोड़कर आगे ले जाने की सोच रखते हैं। मुलायम ने सबको जोड़ने का काम किया, अखिलेश उस जोड़ को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। इसलिए यह नारा सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक जमीन पर भी बेहद मजबूत है—क्योंकि मुलायम सिंह वो नेता थे जिनसे प्रेरणा लेकर हजारों नेता खड़े हुए, और अखिलेश वो नेता हैं जो यूपी की नई पीढ़ी का सपना बन चुके हैं। भाजपा हमेशा विपक्ष के खिलाफ कहानी गढ़ने में माहिर रही है, लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी के पास मुलायम की विरासत और अखिलेश की आधुनिक राजनीति को एक वाक्य में बाँधकर जनता तक ले जाने का मौका है। हर गांव, हर चौपाल, हर घर तक यह संदेश पहुँचना चाहिए कि मुलायम सिर्फ एक जाति या वर्ग के नेता नहीं थे—वह सबके थे। और अब अखिलेश सिर्फ पार्टी के नेता नहीं, बल्कि नए यूपी के सपने का चेहरा हैं। राजनीति में वही नारा सफल होता है जो सरल हो, दिल को छूता हो और हर घर में दोहराया जा सके। “मुलायम सबके थे – अखिलेश सबके हैं” ऐसा ही नारा है जो दिल को भी छूता है और दिमाग में भी बस जाता है, क्योंकि इसमें न सिर्फ मुलायम की महानता छुपी है, बल्कि अखिलेश की सर्वसमावेशी राजनीति का भविष्य भी दिखाई देता है। जब जनता यह याद करेगी कि मुलायम सिंह ने सबका साथ दिया, सभी को ऊपर उठाया, सभी समाजों का सम्मान किया, तब वह यह भी समझेगी कि अखिलेश यादव भी उसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं और उसी राह पर चलते हुए हर समाज, हर वर्ग और हर धर्म को साथ लेकर चलना चाहते हैं।

यही विरासत अखिलेश यादव के हाथ में आई है और यही कारण है कि नारा “मुलायम सबके थे—अखिलेश सबके हैं” सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि मुलायम सिंह की बनाई जातीय-सामाजिक एकता का असली सार है। मुलायम ने गुलदस्ता बनाया था, अखिलेश उसे और बड़ा, और मजबूत बना रहे हैं  यही समाजवादी राजनीति की आत्मा है, यही यूपी की राजनीति की सच्चाई है, और यही 2027 के चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बनेगी—

“मुलायम सबके थे – अखिलेश सबके हैं”

“2027 सिर्फ चुनाव नहीं—समाजवादी आंदोलन की नई परीक्षा है।
हर कार्यकर्ता अपने दिल में यह विश्वास लेकर निकले—
‘मुलायम सबके थे, अखिलेश सबके हैं।’
यही विरासत हमारी ताकत है, यही यूपी का भविष्य है।”

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