Saturday, 10 January 2026

माटी की खुशबू 🌾 80-90 का सुनहरा गाँव

🌾 माटी की खुशबू 🌾

80-90
का सुनहरा गाँव




लेखक: हरिंद्र यादव





समर्पण:
उन गलियों को समर्पित जहाँ बचपन दौड़ा, जहाँ आत्मीयता ने साँस ली।




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पुस्तक परिचय



माटी की खुशबू – 80-90 का सुनहरा गाँव

लेखक: हरिंद्र यादव

 

समर्पण: "उन गलियों को समर्पित जहाँ बचपन दौड़ा, जहाँ आत्मीयता ने साँस ली।"

 

पुस्तक परिचय

यह पुस्तक 1980-90 के दशक के भारतीय गाँव के जीवन की आत्मीय, सरल, और जीवंत झलक प्रस्तुत करती है। गाँव की मिट्टी, त्योहार, खेल, रिश्ते और गीतों से जुड़ी हर वह बात जिसे आज की पीढ़ी केवल कहानियों में सुनती है। यह एक प्रयास है उस जीवन को सहेजने का, जिसे हमने जिया है लेकिन धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं।

 

लेखक परिचय

हरिंद्र यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे गाँव में हुआ। बचपन से ही उन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और सौंदर्य दोनों को नज़दीक से देखा। वे पेशे से सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं लेकिन हृदय से एक संवेदनशील लेखक और लोकसंस्कृति प्रेमी हैं। यह पुस्तक उनकी स्मृतियों और अनुभवों की खुशबू से भरी है।

 

आज की पीढ़ी से

गाँव का जीवन सिर्फ कहानियों में नहीं, संस्कारों में होता है। जो धूल में लोटे हैं, वही जीवन की ऊँचाई को समझते हैं। यह किताब पढ़कर यदि एक भी युवा अपने गाँव, अपने मूल और अपने रिश्तों से जुड़ जाएतो यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

 

पुस्तक का नाम:  "मेरा गाँव – 80-90 का दौर

लेखक: हरिंद्र यादव

समर्पण: "उन गलियों को समर्पित जहाँ बचपन दौड़ा, जहाँ आत्मीयता ने साँस ली।"

भूमिका: जब आंख खुली, तो मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छत वाला घर सामने था। घर की चौखट से बाहर झांकते ही खुला आसमान, खेतों में फैली हरियाली और बैलों की घंटियों की आवाज़ें मिलती थीं। वो एक ऐसा संसार था जहां हर सांस में मिट्टी की सोंधी खुशबू बसती थी।

इस पुस्तक में मैंने अपने गाँव के उस सुनहरे दौर को संजोने की कोशिश की है, जिसे आज की पीढ़ी सिर्फ किस्सों में सुनती है। यह आत्मीयता, अपनापन, मेहनत और सरलता का वह संसार है जो शायद फिर कभी लौटकर नहीं आएगा।

अनुक्रमणिका:

मिट्टी की दीवारों वाला घर

खेत, बैल और दादा की जोत

मिट्टी के बर्तन और नहर की ठंडक

गन्ना, मटर और भागना

गलियों का खेल और अखाड़े की कुश्ती

रामनवमी, चंदा और मेला

ढिबरी, लालटेन और गीतों की रात

छप्पर उठाना, शादी और सहयोग

आम का बाग और होली की तैयारी

साइकिल, टीवी और क्रिकेट का जुनून

फिल्म, पोस्टर और टांगा

आत्मीयता की वो मिठास

संगीत और मधुर यादें

आज का गांवयादों की छाया

लेखक की बात

आज की पीढ़ी के लिए संदेश

 

अध्याय 1: मिट्टी की दीवारों वाला घर

मिट्टी की खुशबू में पले, खपरैल की छांव में खेले, वो दिन लौटें लौटें, यादों में आज भी झलके।

गाँव की सुबह मुर्गे की बांग और बैलों की रुनझुन से होती। जब आंख खुली, सामने मिट्टी से बने घर की दीवारें और ऊपर खपरैल की छत दिखती। दरवाजे से झांकते ही चारों ओर हरियाली, खेतों की महक और जीवन की सादगी थी।

माँ सुबह जल्दी उठकर घर बुहारतीं, दादी तुलसी में जल चढ़ातीं। घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे चबूतरा था, वहीं बैठकर बुजुर्ग गप्पें मारते। दीवारों पर गोबर से लिपाई होती, रंगोली बनती।

उस घर में लकड़ी का फर्नीचर था, पंखालेकिन सुकून भरपूर था। गर्मियों में छत पर चारपाई बिछती, और तारों भरे आसमान के नीचे नींद आती।

 

अध्याय 2: खेत, बैल और दादा की जोत

बैलों की जोड़ी, हल की धार, दादा की आँखों में श्रम का सार।

बचपन का सबसे बड़ा स्कूल खेत ही था। जब सुबह-सुबह दादा बैलों को लेकर खेत की ओर निकलते, हम भी पीछे-पीछे नंगे पाँव मिट्टी में दौड़ते। उनके हाथ में लकड़ी का हल होता, जिसे बैल खींचते और धरती की छाती पर गहरी रेखाएँ बनती जातीं।

हम कभी हल की मूठ पकड़ने की जिद करते, कभी बैलों के नाम लेकर उन्हें पुकारते — "नंदू, भोला चलो!" और दादा हँसते हुए कहते, "अभी छोटे हो, जब बड़े हो जाओगे तब जोतना।"

खेत में काम करते समय माँ घर से आटा गूंथकर, सत्तू और प्याज के साथ टिफिन भेजतीं। दोपहर में बबूल के पेड़ की छाँव में बैठकर खाना खातेदादा, हम और बैल। बची हुई रोटी बैलों को खिलाना जैसे परंपरा थी।

बैल कोई जानवर नहीं थे, वो परिवार के सदस्य थे। उनके गले में बँधी घंटियाँ जब चलते समय बजतीं, तो जैसे खेत में संगीत गूंजता।

हल चलाना, बीज बोना, पानी देनासब कुछ दादा सिखाते। उनका धैर्य, उनकी मेहनत, और मिट्टी से उनका प्रेम हमें अनजाने में ही संस्कार दे जाता।

 

अध्याय 3: मिट्टी के बर्तन और नहर की ठंडक

गर्मियों की दोपहर थी। चारों ओर सुनसान पसरा रहता, जैसे समय थम गया हो। ऐसे समय में हम बच्चे निकल पड़ते थे अपनी दुनिया मेंजहाँ मिट्टी हमारे खेल की साथी होती, और नहर की धार हमारी राहत की ठंडी छाया।

हमारे गाँव में मिट्टी सिर्फ खेतों की उपज के लिए नहीं थी, वो हमारे जीवन का हिस्सा थी। मैं और मेरे जैसे कई बच्चे, तालाब किनारे की चिकनी मिट्टी को बाल्टी में भर कर लाते और आँगन में जमा कर देते। फिर शुरू होता हमारा छोटा कारखानावहाँ हम छोटे-छोटे मिट्टी के खिलौने, छोटे घड़े, दीये, और कटोरियाँ बनाते। हाथों से उन्हें आकार देते, कभी कोई गोल नहीं बनता तो हँसी-हँसी में उसे तोड़कर दोबारा बनाते।

जब वे सूख जाते, तो उन्हें रंगतेकभी लाल गेरुआ, कभी पीला, कभी अपने स्कूल की पुरानी कॉपी से फटे चित्रों को चिपका कर सजाते। उस समय रंग और ब्रश हमारे पास नहीं होते थे, पर हमारी कल्पना ही सबसे बड़ा रंगकार होती थी।

और फिर आती थी नहर की ठंडक। गाँव के बाहर एक नहर बहती थी, सीधी-लंबी, नीले आकाश का प्रतिबिंब समेटे। गर्म दोपहर में, जब कोई बड़ा नहीं देख रहा होता, हम कपड़े पेड़ की डाल पर टाँग कर छलांग लगा देते उस बहती ठंडक में। नहर की धार में तैरना सीखना जैसे जीवन की पहली आज़ादी थी। कोई बच्चा पानी में डरता तो बाकी उसे बाँह पकड़ कर खींचते। कुछ तैराक दोस्त "डुबकी मार के किनारे पार" का खेल खेलते।

हमारी दुनिया वहीं थीमिट्टी में सना शरीर, गीले बाल, और चेहरे पर आज़ादी की मुस्कान।

कभी-कभी गाँव में बायस्कोप वाला आता। उसके आने की आहट जैसे पूरे गाँव में बिजली दौड़ा देती। वह एक लकड़ी का बक्सा लाता, जिसके एक सिरे पर गोल गोल झरोखे होते। हम बच्चे पंक्तिबद्ध खड़े हो जाते, एक-एक कर आँखें उस झरोखे में गड़ाते, और वह अंदर से चक्का घुमाता। 'राजकपूर', 'मधुबाला', 'हीरो-हीरोइन' की तस्वीरें घूमतीं, और एक मधुर आवाज़ आती
"देखिए बॉम्बे की बड़ी इमारतें, देखिए प्रेम कहानी, देखिए बाघ से लड़ता वीर"...

उस दिन हमें कुछ पैसे भी मिलते थेकभी माँ से माँगी भीख, कभी किसी रिश्तेदार की जेब से चुराया सिक्का। लेकिन जो मिलता, वो पूरे दिन के जादू के लिए काफी था।

शाम को घर लौटते समय, हम मिट्टी से सने पैरों और भीगे कपड़ों के साथ, अपने सपनों की गठरी लिए लौटते। किसी के हाथ में रंगा मिट्टी का घोड़ा होता, किसी के मन में शहर की बायस्कोप वाली दुनिया। लेकिन एक बात समान थीहम सब अपने छोटे-से संसार में पूरे थे, संतुष्ट थे।

आज जब एयर कंडीशनर की हवा में बैठे-बैठे सोचता हूँ, तो याद आती है वो नहर की ठंडी लहरें, वो कच्चे आँगन में मिट्टी का सौंधा एहसास, और वो चिल्ल-पों करता बचपन
जिसमें मोबाइल था, टीवी,
लेकिन हर दिन में एक कहानी होती थी, और हर शाम में एक सुख।

 

अध्याय 4: गन्ना, मटर और भागना
(बचपन की शरारतें और खेतों की मिठास)

गाँव का वो मौसम आज भी मन में ताज़ा हैजब खेत, मेड़, और झाड़ियों की दुनिया ही हमारी असली पाठशाला थी। सर्दी के दिन होते, ओस की बूँदें घास पर चमकतीं और हम 4–5 शरारती दोस्त साइकिल के बिना ही खेतों की ओर निकल जाते। कोई नाम लेकर नहीं बुलाता थाबस इशारा ही काफी होता, और समझ जाते कि आज "मटर मिशन" या "गन्ना अभियान" पर निकलना है।

खेतों में दाख़िल होना एक अलग ही रोमांच होता था। गन्ने की कतारें किसी भूलभुलैया जैसी लगतीं। हम झुकते, दबे पाँव चलते और सबसे मोटे-ताज़े गन्ने को निशाना बनाते। एक हाथ में गन्ना तोड़ते, दूसरे से छीलते और तीसरे दोस्त को चौकसी में लगाए रखतेकहीं काका या खेत के मालिक ने देख लिया तो...? पर भूख और मस्ती डर से बड़ी होती थी।

मटर की बात ही निराली होती। खेतों में बैठे-बैठे एक-एक फली तोड़ते, दाँतों से खोलते और हरे मोतियों जैसे दानों को मुँह में भर लेते। कभी-कभी कोई कच्चा टमाटर या हरी मिर्च भी साथ में मिल जाती तो स्वाद और मज़ा दोनों दोगुना हो जाता।

पर असली धमाका तब होता जब कोई खेत वाला या काका दूर से ललकार देता
अबै! कौन है खेत में? भाग सालो!”

और हम सचमुच बिजली की रफ्तार से भागते! झाड़ियों में छिपते, किसी नाले के पार कूदते, और तब तक नहीं रुकते जब तक साँस फूल जाए। भागते-भागते हँसी नहीं रुकती थीगन्ना हाथ में ही होता, मटर की फली जेब में और दिल में अजीब सी मिठास। वो डर भी मज़ा देता थाजैसे खेल का एक हिस्सा हो।

शाम को घर लौटते तो माँ पूछती, “कहाँ थे दिनभर?”
हम बहाना बना देते, “बस तालाब के पास खेल रहे थे।
और माँ मुस्कुरा देतीशायद सब जानती थी, पर कहती कुछ नहीं।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता हैवो भागना, वो चुराना, वो शरारतें... सब कुछ जैसे एक पाठशाला थीं। खेतों की वो मिट्टी, गन्ने की मिठास, और दोस्तों की वो संगतजीवन के सबसे कीमती पल थे।

अब खेतों की जगह ईंटों की दीवारें हैं, और झाड़ियों की जगह मोबाइल स्क्रीनें। पर मन के किसी कोने में आज भी वो गन्ना, वो मटर और वो भागते क़दम ज़िन्दा हैं।

अध्याय 5: गलियों का खेल और अखाड़े की कुश्ती
("जहाँ मिट्टी में लोटना, जीत से ज़्यादा दोस्ती सिखाता था")

गाँव की साँझ का मतलब ही कुछ और होता था। सूरज ढलते ही जैसे पूरा मोहल्ला जाग उठता। हमारे लिए वो समय किसी त्यौहार से कम नहीं होता। घर के बाहर की कच्ची गलियों में धूल उड़ती थीपर उसी धूल में हमारे बचपन के सबसे सुनहरे पल दबे पड़े हैं।

हमारे खेल बड़े सीधे-सादे पर जुनून से भरे होते। कभी कंचे जेब में भरे घूमते, तो कभी गिल्ली-डंडा के लिए टूटी हुई लकड़ी को भी खजाना समझते। कबड्डी मेंकबड्डी-कबड्डी…” की एक साँस में दौड़ होती, जहाँ हारने पर भी हँसी उड़ती, और जीतने पर सबको गले लगाते। हममें से किसी को ब्रांडेड जूते नहीं चाहिए थे ही कोई महंगे मैदान। बस, अपने दोस्तों का साथ और मिट्टी में खेलने की आज़ादी ही सब कुछ था।

गली के उस मोड़ पर एक चबूतरा था, जहाँ बैठकर बड़े बूढ़े बीड़ी सुलगाते हुए लठ की बातें करते। वहीं बगल में गाँव का छोटा-सा अखाड़ा थाकोई बाँस की चारखंभा चौपाल, कोई रस्सी से बँधी सीमाएँ नहींबस एक खुली मिट्टी का मैदान। वहीं पहलवान लंगोट कसकर आते, शरीर पर सरसों का तेल चमकता और चेहरे पर आत्मविश्वास। हम बच्चे दूर से देखकर जोश में जाते। अखाड़े में जब दो देह भिड़तीं, तो पूरी भीड़हा रे भाई!” “चित्त कर दे!” की आवाज़ों से गूँज उठती।

गाँव में हर कोई जानता था किसका हाथ भारी है, किसका दाँव झपट्टा। पर सबसे सुंदर बात यह थी कि कुश्ती खत्म होते ही दोनों पहलवान एक-दूसरे को उठा लेते, जैसे कह रहे होंलड़ाई खेल का हिस्सा है, दुश्मनी नहीं।

उन गलियों का खेल सिर्फ शरीर को नहीं, मन को भी मज़बूत करता था। जहाँ हार को झेलना और जीत में संयम रखना सिखाया जाता। जहाँ गिरकर उठने की आदत बचपन से ही डाल दी जाती।

आज जब देखता हूँ, मोबाइल में खोए बच्चों को, तो लगता हैवो मिट्टी में सने वो पल ही असलीस्क्रीन टाइमथा। जहाँ हर तस्वीर, हर मूवमेंट रियल था, और हर हँसी दिल से निकलती थी।

अध्याय 6: रामनवमी, चंदा और मेला

गाँव में जब भी रामनवमी का पर्व आता, तो जैसे पूरे गाँव की रगों में भक्ति और उल्लास एक साथ दौड़ने लगता। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक पर्व था जो सबको एक डोरी में बाँध देता थाबच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, जवानसबकी भागीदारी होती।

हम किशोरों की टोली पहले से ही जुट जातीचंदा इकट्ठा करने में। कोई किसान के घर जाता, कोई दुकानदार के पास।रामनवमी का मेला है, चंदा दीजिए,” कहने भर की देर होती, लोग रुपये, अनाज या जो बन पड़े, सहयोग दे देते। एक साथ घूमना, चंदा इकट्ठा करना, उसके बाद एक पेड़ के नीचे बैठकर हिसाब लगानायह सब किसी आयोजन से ज़्यादा एक अनुभव होता था, जो दोस्ती, जिम्मेदारी और आनंद का पाठ पढ़ाता।

गांव के चबूतरे पर रामलीला होती। कोई राम बनता, कोई लक्ष्मण, कोई रावण और सबसे दिलचस्प होतासीता का किरदार। सीता बनने के लिए अक्सर कोई लड़का चुना जाता, जो नाटकीय भावभंगिमाओं में सबका मन मोह लेता। लोग हँसते भी, चुटकी भी लेते, पर वही लड़का सबका प्रिय बन जाताउसकी अदाओं में सहजता होती, मासूमियत होती।

मेला जब लगता, तो जैसे पूरा गाँव एक रंग-बिरंगी चादर ओढ़ लेता। मिट्टी की पगडंडियों पर भीड़ उमड़ती, झूले घूमते, बर्फ के गोले लाल-नीले रंग में रंगे मिलते। गुब्बारे बेचने वाला बार-बार आवाज़ लगाता, "गुब्बारा लो जी गुब्बारा!" और हम बच्चे ज़िद करतेमाँ-बाबा के पाँव पकड़कर, “एक गुब्बारा दिलवा दो!”

कुछ ही कदम पर खिलौने वाले की दुकान होतीलकड़ी के घोड़े, मिट्टी की सीटी, और चकरी। हम सब जेब में पड़े पैसे जोड़कर कुछ कुछ खरीद ही लेतेऔर फिर बाकी का मेला घूमते हुए खा लेते चीनी की जलेबी या इमली की गोलियाँ।

शाम होते-होते जब आरती की घंटियाँ बजतीं और पूरा गांवराम लक्ष्मण जानकी, जय बोलो हनुमान कीके जयघोष से गूंजतातो भीतर कुछ शांत सा हो जाता। वो सिर्फ त्यौहार नहीं था, वह एक एहसास था — belongingness का, simplicity का, उस जीवन का जो अब किताबों में ही मिलता है।

इस अध्याय का सार:
यह वह समय था जब त्यौहार केवल पूजा नहीं, लोगों के साथ जीने का एक तरीका था। जहां बच्चे सीखते थे मंच पर बोलना, सहयोग करना, और हर किरदार में खुद को ढालना। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता हैउन चंदा की रसीदों में, सीता बने दोस्त की मुस्कान में, और बर्फ के गोले मेंपूरा बचपन बंद है।

अध्याय 7: ढिबरी, लालटेन और गीतों की रात
(
विस्तारित रूप में)

गाँव की वो रातें आज भी स्मृतियों में दीपशिखा-सी जलती हैं। उन दिनों बिजली का कोई नामोनिशान नहीं था। शाम ढलते ही अंधकार धीरे-धीरे पसरने लगता और उसी अंधेरे को चीरती हुई ढिबरी की मद्धम लौ जल उठती। किसी घर में पीतल की ढिबरी, तो कहीं लालटेनजो हवा में हिलती, लहराती और दीवारों पर झीनी परछाइयाँ बुनती।

औरतें चउरा (घर का आँगन) में बैठ जातीं। कोई ओढ़नी से सिर ढकती, कोई बच्चा गोदी में लिए बैठतीऔर फिर शुरू हो जाता लोकगीतों का सिलसिला। "जोगिया साजन आये ना...", "चलो रे झूला डारो..." जैसे गीतों की स्वर-लहरियाँ हवाओं में घुल जातीं।
कभी कजरी, कभी सोहर, तो कभी बिरहा।
हर गीत में जीवन थाप्रेम था, पीड़ा थी, विरह था।

पुरुष चौपाल पर जुटते। किसी के हाथ में हुक्का होता, कोई खैनी मलता, कोई सिर पर गमछा डाले चुपचाप बैठा सुनता।
फिर कोई बुज़ुर्ग किस्सा छेड़ देता
एक बार मढ़ी के पास भूत दिखा था…”
सबकी आँखें फैल जातीं।
या फिर चोर की कहानी, या राजा-रानी की गाथा, या फिर बचपन के दिनजब वो खुद भी नंगे पैर खेतों में भागे थे।

कभी-कभी ढोलक निकल आती, और गाँव की कोई दादी माँ नाचनी बन जाती
गेरुआ साड़ी पहनकर, कमर में घुँघरू बाँधकर लय में झूमतीं
और हम बच्चे तालियाँ बजाते।
वो गीतों की रातें केवल मनोरंजन नहीं थीं
वो रिश्तों की मिठास, परंपराओं की जीवंतता और गाँव के सांस्कृतिक जीवन का आईना थीं।

आज जब बिजली की रोशनी में सबकुछ उजला हैतब भी दिल उसी ढिबरी की लौ के पास बैठकर उन गीतों को सुनना चाहता है।

अध्याय 8: छप्पर उठाना, शादी और सहयोग
(
विस्तारित संस्करणसंस्मरण शैली में)

गाँव में एक छप्पर का गिरना सिर्फ किसी एक घर की समस्या नहीं होती थीवो पूरे टोले का मामला बन जाता था। जैसे ही खबर फैलती — “अरे, फलाने के यहाँ छप्पर गिर गया बा” — वैसे ही लोग अपने-अपने घरों से बांस, घास, सरपत, मिट्टी और रस्सी लेकर चल पड़ते।
किसी के पास मजबूत बाँस होता, कोई चारपाई से रस्सी खोल लाता, कोई अपना हंसिया या कुदाल थमा देता।
बिना बुलाए, बिना आग्रहमानो गाँव की रगों में मदद करना ही धर्म हो।

पुरुष छप्पर उठाते, महिलाएं पानी लाकर मिट्टी गीली करतीं, बच्चे घास और पत्ते लाते। सबके चेहरों पर पसीना होता, पर किसी के मन में बोझ नहींक्योंकि यही हमारी परंपरा थी:
दूसरे के दुख में साथ खड़ा रहना, ही गाँव की असली तहज़ीब थी।

इसी तरह शादियाँ भी अकेले किसी परिवार की नहीं होती थीं।
पूरा गाँव जैसे बारात का हिस्सा बन जाता था।
बिना कार्ड, बिना मोबाइल फोनफिर भी हर किसी को पता होता कि कौन-कहाँ-कब जा रहा है।

शादी के पहले दिन से ही हलचल शुरू हो जाती।
लड़कियाँ पत्तल और दोना बनाने में जुट जातीं।
बच्चे आँगन में उबटन की तैयारी करते।
पुरुष मंडप सजाने और टेंट गाड़ने में लग जाते।
बुढ़ी दादियाँ पकवानों की देखरेख करतींजैसे वो ही उस रस्म की असली पहरेदार हों।

बारात वाले दिन तो जैसे मेले-सा माहौल होता।
पंगत लगती तो गांव के लड़के बिना कहे थालियाँ परोसने लगते।
किसी के हाथ में बाल्टी होती, किसी के हाथ में रसगुल्ले की परात।
साफा बाँधे लड़के बड़े गर्व से कहते,
हम बिटिया के भाई हैं…!”

बारातियों का स्वागत गीतों से होता
अरे जीजा मोर आवत बाड़े नाचे बाजे संग…”
और जब बिदाई की घड़ी आती, तो गाँव की हर आँख नम हो जाती।
कभी दुल्हन अपनी सखी को गले लगाकर कहती
ख्याल रखिह, माई बाबू के…”
तो कभी माँ आँचल से आंसू पोछते हुए कहती
बेटी सुखी रहो…”

इस आपसी सहयोग और आत्मीयता की छांव में पलता था हमारा गाँव।
ना कोई अकेला था, ना कोई पराया।
सबके सुख-दुख एक-दूसरे के थे।

आज शहर में हर चीज़ के लिए पैसा देना पड़ता हैलेकिन गाँव की वो मदद दिल से मिलती थी।
बिना कीमत, बिना शर्तबस आत्मीयता में डूबी हुई।

अध्याय 9: सावन की झूला और राखी की डोर

सावन का महीना आते ही गांव की फिजा ही बदल जाती थी। हरियाली जैसे खेतों की छाती से फूट पड़ती। नीम, आम, जामुन के पेड़ों की शाखों पर झूले पड़ जाते। लड़कियों की टोलियां बनतींरंगीन साड़ियाँ, लाल चूड़ियाँ, हाथों में मेहंदी और पैरों में पायल की छनक। एक ओर झूला झूलतीं, तो दूसरी ओर सावन के गीतों से गांव की हवा में सुर घुल जाते:

"काहे को डारो झूला, नीम के पातवा, सावन आयो रे..."

बारिश की बूँदों में भीगती हँसी, झूले की ऊँचाई पर उड़ती चूड़ियों की खनक और पत्तों की सरसराहटसब मिलकर एक अलौकिक राग रचते। खेतों में धान की रोपाई चलती, लेकिन शाम को झूला और गीतयही असली सुकून होता।

फिर आता राखी का त्योहारभाई-बहन के रिश्ते का सबसे प्यारा पर्व। बहनें अपने मायके आतींहाथ में राखी, थाली में रोली, चावल और मिठाई। भाई राखी बँधवाकर सिर झुकाते, बहनों से आशीर्वाद लेते और वादा करते — "हर हाल में तुम्हारी रक्षा करूंगा।"

भले ही जेब में पैसे कम हों, लेकिन दिल बड़ा होता। बहन को नई चुन्नी, सिंदूरदान या कभी सिर्फ दो रुपये का सिक्का भी दे दिया जाताऔर वह भी प्यार से लिपटा होता।

गांव की वो राखी की सुबहजब गली में बहनों की हँसी गूंजती, और दोपहर तक हर घर से गीत सुनाई देते:

"बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बांधा है..."

शाम को मिलजुल कर खाना बनतापूड़ी, कचौरी, आलू-टमाटर की सब्ज़ी और खीर। पूरा परिवार एक साथ बैठता, रिश्तों की मिठास में डूबा।

सावन और राखी का यह संगम, केवल त्योहार नहीं थेवे हमारी संस्कृति की वो जड़ें थीं, जो प्रेम, सहयोग और रिश्तों की डोर को मज़बूत करती थीं।
आज भी सावन की फुहार या राखी की डोर छू जाएआंखें भीग जाती हैं, और दिल कह उठता है
"काश वो गांव, वो झूले, वो राखी फिर से लौट आए..."

अध्याय 10: साइकिल, टीवी और क्रिकेट का जुनून

गांव में साइकिल होना एक गर्व की बात थी। जब कोई नए हैंडल और घंटी वाली साइकिल लेकर निकलता, तो बच्चे पीछे-पीछे दौड़ते, और बूढ़े कह उठते — “देखो, राजा बाबू चले रहे हैं!” हमारी अपनी साइकिल नहीं थी, लेकिन दूसरों की सवारी में अपनी खुशी ढूंढ लेते थे। कई बार तो स्कूल जाने का बहाना बनाकर दोस्त की साइकिल घंटों चला आते। एक पहिये पर संतुलन बनाना, सीट पर खड़े होकर चलानाये सब करतब हमारे लिए शौक नहीं, पहचान बन जाते थे।

फिर आया वो दिन जब हरिया चाचा के घर B/W टीवी आया। एंटीना ट्यून करते-करते पूरा टोला छत पर चढ़ जाता। "थोड़ा बायेंअब दायेंहां, वहीं पकड़ो!" — ये आवाज़ें आसमान में गूंजतीं। रविवार की सुबह जैसे त्योहार बन जातीजब दूरदर्शन पर 'रामायण' या 'महाभारत' आता। घर के अंदर जगह नहीं होती, तो लोग दरवाज़े-खिड़कियों से झांककर टीवी देखते। राम के वनवास पर अम्मा की आंखों से आंसू बहते, और रावण-वध पर सब "जय श्री राम!" कह उठते।

1983 में जब भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता, तब हमारे गांव के मैदान में भी बल्ला और गेंद की गूंज सुनाई देने लगी। टीन के डिब्बे विकेट बनते, और नारियल की रस्सी से बनाई गई गेंद से मैच खेला जाता। "गावस्कर बनूंगा", "कपिल जैसा छक्का मारूंगा" — ये हमारे सपनों की शुरुआत थी।
कभी स्कूल के बस्ते में किताब से ज़्यादा बैट-बॉल होता, और होमवर्क से ज़्यादा स्कोर गिना जाता। दोपहर की तपती धूप भी हमें मैदान से रोक नहीं पाती।

टीवी, साइकिल और क्रिकेटइन तीनों ने हमारे बचपन को सपनों, साहस और सामूहिक उल्लास से भर दिया था। इनकी झलक आज भी दिल में वैसी ही चमकती है, जैसी रामायण की भव्यता, साइकिल की घंटी, और उस पहले छक्के की आवाज़।

अध्याय 11: फ़िल्म, पोस्टर और टांगा

गांव के दिनचर्या में जब monotony छा जाती, तब फ़िल्मों का प्रचार एक नयी ऊर्जा लेकर आता। सुबह-सुबह लाउडस्पीकर की आवाज़ हवा में तैरती
सुनिए! सुनिए! कल रात बासगांव के लक्ष्मी टॉकीज में देखिए धर्मेंद्र की ज़बरदस्त पिक्चर — 'शोले'! गोली, बम, और बसंती का धमाल!"

हम बच्चे उस आवाज़ के पीछे दौड़ते, और दूर से आती साइकिल या टांगे पर लगे पोस्टर को देखने की कोशिश करते। वो पोस्टर रंगीन होते, जिनमें हीरो हाथ में रिवॉल्वर लिए खड़ा होता, और हिरोइन उड़ती साड़ी में इतराती।
पक्के दीवारों पर बड़े-बड़े ब्रश से लिखे फिल्मी नाम — “दीवार”, “मुकद्दर का सिकंदर”, “नगीना” — हमारे ख्वाबों का हिस्सा बनते गए। पोस्टर को गौर से देखना और उसके दृश्यों की कल्पना करना भी किसी फ़िल्म देखने से कम नहीं होता।

फ़िल्म देखने का आयोजन कोई साधारण बात नहीं थी। तैयारी एक दिन पहले से होती। चाची सब्ज़ी जल्दी पका देतीं ताकि हम शाम तक तैयार रहें। फिर निकलते हमटांगा हमारी लिमोसीन होता। उस टांगे में बैठकर बासगांव जाना जैसे किसी और ही दुनिया की यात्रा हो।

टांगेवाले से हमारा रिश्ता पैसों का नहीं, अपनत्व का होता था। वो पूछता
"काका रहे हैं? बच्चा लोग सब तैयार है?"
हम जवाब देते — "हां भैया, इस बार शोले देखेंगे। गब्बर वाला!"

टांगे की टक-टक, बैल की रफ्तार, और खेतों के बीच से गुजरती हवाओं के साथ हम धीरे-धीरे सिनेमा हॉल की ओर बढ़ते। वहां की भीड़, टिकट की लाइन, और फिर परदे पर चलता सजीव संसारवो अनुभव जीवन भर की पूंजी बन जाता।

रात में जब फ़िल्म देखकर वापस लौटते, तो गांव की गलियों में ही हम हीरो बन जाते। कोई धर्मेंद्र की नकल करता, तो कोई गब्बर का डायलॉग दोहराता
"अरे सांभा, कितने आदमी थे?"

फ़िल्में हमारे लिए महज़ मनोरंजन नहीं थीं। वो हमारे सपनों की उड़ान थीं, हमारी कल्पनाओं का विस्तार थीं। पोस्टर, प्रचार और टांगातीनों मिलकर हमें उस दुनिया से जोड़ते थे, जहां से लौटकर हम कुछ देर के लिए खुद को किसी फ़िल्मी किरदार से कम नहीं समझते थे।

इसी रंगीन झलकियों ने गांव के सीधे-सादे जीवन में भी कुछ फिल्मी रंग घोल दिए थे।

 

अध्याय 12: आत्मीयता की वो मिठास

(गाँव की आत्मारिश्तों की गर्माहट और सहयोग की परंपरा)

गाँव सिर्फ ईंट-पत्थर से बने घरों का समूह नहीं होता
वो एक भावना है, जहाँ हर दरवाज़ा खुला होता है, और हर चेहरा परिचित।

हमारे गाँव की सबसे अनमोल पूँजी थीवहाँ के लोग, उनका स्वभाव, और वह अद्भुत आत्मीयता, जो हर रिश्ते, हर संबंध को मिठास से भर देती थी।
जब कोई बीमार होता, तो डॉक्टर बुलाने से पहले आधा गाँव उसकी खैर-खबर ले आता।
"चाय बनी?" से पहले पूछते — "बुखार उतरा कि नहीं?"

घर सिर्फ अपना नहीं होता था

अगर हमारे घर में शादी है, तो आधा गाँव हमारे घर में आकर दिन-रात साथ खड़ा रहता।
कोई हलवाई बन जाता, कोई मेहमानों को पानी पिलाता, कोई लड़की के गहनों की रखवाली करता।
शादी का खर्च भले एक परिवार उठाए, लेकिन मेहनत और सेवा पूरे गाँव की होती थी।

बिन कहे मदद करने की परंपरा

अगर किसी के घर में दुःख जाए, तो आवाज़ उठाने की ज़रूरत नहीं होती थी।
सारे लोग खुद--खुद जुट जाते थे
कभी घास काटने, कभी खाना बनाने, कभी ढाढ़स देने।
उन दिनों तेरा दुख मेरा दुख कोई कहावत नहीं, बल्कि जीवन का नियम था।

रिश्ते नाम से नहीं, व्यवहार से बनते थे

मोहल्ले की हर औरत 'माँ' होती, हर बूढ़ा 'बाबा' कहलाता।
हम हर पड़ोसी के घर ऐसे जाते जैसे वो अपना ही आँगन हो।
बिना दरवाज़ा खटखटाए प्रवेश करते, और चूल्हे पर चढ़ी रोटी को खुद पलट देते।

प्याले की चाय और दिल का अपनापन

गाँव में जब भी कोई मेहमान आता, सबसे पहले उसके लिए चूल्हे पर चाय चढ़ती।
और चाय की मिठास, उस आत्मीयता की तरह होती, जो शब्दों से नहीं
व्यवहार से छलकती थी।

बचपन की सबसे प्यारी स्मृति

मुझे आज भी याद है, जब एक बार मेरी माँ बीमार हो गई थीं।
तब घर की सारी जिम्मेदारी आस-पड़ोस की औरतों ने संभाली।
कोई आकर झाड़ू लगाती, कोई दाल चढ़ा देती, और कोई मुझे तैयार करके स्कूल भेजती।
उस वक़्त मैंने जानागाँव का रिश्ता खून से नहीं, दिल से जुड़ता है।


अध्याय का सार:

गाँव की आत्मीयता सिर्फ एक सामाजिक गुण नहीं थी
वो जीवन का मूल आधार थी।
जहाँमैंऔरतूनहीं था
बसहमथे।
वो समय आज भले ही बीत गया हो,
लेकिन उन रिश्तों की मिठास आज भी दिल के किसी कोने में गुड़ की डली की तरह घुलती रहती है।

 

अध्याय 13: संगीत और मधुर यादें

गाँव के जीवन में संगीत केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ था। यह वो धुन थी जो खेतों की मिट्टी से उठती थी, तालाब की लहरों में लहराती थी और हवा के झोंकों में समा जाती थी। संगीत गाँव के हर क्षण में रचा-बसा थाचाहे वो किसी पर्व का उल्लास हो, या किसी विदाई का ग़म।

रात के अंधेरे में जब गाँव के किसी घर से ढोलक की थाप सुनाई देती, तो समझो वहाँ कोई खुशी है। औरतें चौपाल पर बैठकर झूम-झूमकर गातीं — "बन जा तू मेरी राधा, मैं बनूं तेरा श्याम..." ढोलक की थाप पर थिरकती हथेलियाँ, मंजीरे की झंकार, और हारमोनियम की मीठी तानसब मिलकर एक ऐसा सुर रचते कि लगता जैसे खुद प्रकृति भी मुस्कुरा रही हो।

लता मंगेशकर की आवाज़, मोहम्मद रफी के नग़मेरेडियो पर बजते और पूरा गाँव सुनता। खेत में काम कर रहे लोग भी कान लगाकर उन सुरों को आत्मा में समेट लेते। बिजली नहीं होती थी, तो भी रेडियो की बैटरी बदलवा दी जाती थी, ताकि शनिवार की रातबिनाका गीतमालाकोई चूके।

त्योहारों पर रामलीला या देवी जागरण होता, तो रातभर जागकर लोग भक्ति में झूमते। बच्चे भी माँ की गोद में सोते-सोते वो गीत सुनते और बड़े होकर उन्हें दोहराते।

बारिश की रातों में टीन की छत पर गिरती बूंदों की टप-टप भी एक मधुर संगीत बन जाती थी। अकेलेपन में बैलों की घंटियों की आवाज़, या दूर मंदिर की आरती की धुनएक सुकून देती थी।

आज जब सब डिजिटल हो गया है, तो संगीत भी मशीनों से निकलता हैपर उसमें वो आत्मा नहीं जो गाँव के संगीत में थी। अब स्पीकर की आवाज़ तेज़ होती है, लेकिन मन को छूती नहीं।

गाँव का वो संगीत, वो लोकगीत, वो चौपाल की गूंजआज भी दिल के किसी कोने में धड़कते हैं। वो गीत नहीं भूले हैं, वो स्वर नहीं मिटे हैं। वे आज भी भीतर कहीं गूंजते हैंजब मन थक जाता है, तो वही पुरानी धुनें उसे सहला जाती हैं।

वो संगीत, जो केवल कानों से नहीं, आत्मा से सुना जाता थावही आज भी मधुर यादों के रूप में जी रहा है।

 

अध्याय 14: लेखक की बात

जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो गांव की गलियों में बसी वो मासूमियत, खेतों की हरियाली में छुपी सादगी, और जीवन की कठिनाइयों में पनपा धैर्य मेरी आत्मा को आज भी छू जाता है।
आज हम सुविधाओं से घिरे हैं, लेकिन संतोष शायद कहीं खो गया है। जो बातें कभी हमारे जीवन का हिस्सा थींजैसे आपसी मेल-जोल, बड़ों का सम्मान, और सीमित संसाधनों में जीने की कलावो अब अतीत बनती जा रही हैं।

इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य यही है कि हम उस दौर की खुशबू को फिर से महसूस करें। क्योंकि वो दौर सिर्फ बीता समय नहीं था, वो हमारे संस्कारों, मूल्यों और संघर्षों की पाठशाला था।

आज जब गांव आधुनिकता की दौड़ में शामिल हो रहा है, तब यह ज़रूरी हो गया है कि हम अपनी जड़ों को भूलें। यह पुस्तक एक विनम्र प्रयास हैमिट्टी की उस गंध को संजोने का, जो हमें इंसान बनाती है।

आज की पीढ़ी के लिए संदेश

जड़ों से जुड़ें: आधुनिक जीवन अपनाएं, लेकिन अपने गांव, परंपरा और बुजुर्गों की सीख को भूलें।

संस्कार बनाम स्टाइल: बाहर की चमक-दमक से ज्यादा ज़रूरी है भीतर के मूल्य। चरित्र से बड़ा कोई फैशन नहीं।

सादगी में शक्ति है: जीवन को आसान बनाएं, जटिल नहीं। सादा भोजन, सच्ची बात, साफ़ इरादायही असली अमीरी है।

वृद्धों का सम्मान करें: जो आज हैं, वही कल आप होंगे। बुजुर्गों के अनुभव आपकी सबसे बड़ी संपत्ति हैं।

प्रकृति से प्रेम करें: खेत, पेड़, मिट्टी, पानीये सिर्फ संसाधन नहीं, हमारे जीवन के स्तंभ हैं। इन्हें सहेजें।

शिक्षा को हथियार बनाएं: सिर्फ डिग्री नहीं, सोच विकसित करें। सवाल करना, समझना और आगे बढ़नायही असली पढ़ाई है।

एकता और सहयोग की भावना रखें: गांव हो या शहर, परिवार हो या समाजअकेले कोई नहीं चलता। साथ मिलकर ही बदलाव आता है।

  

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