Wednesday, 15 July 2026

सोनम बागचू का आमरण अनशन: आखिर समाज अपने अधिकारों के लिए कब जागेगा?

सोनम बागचू का आमरण अनशन: आखिर समाज अपने अधिकारों के लिए कब जागेगा?

क्या किसी समाज की सबसे बड़ी त्रासदी बेरोज़गारी होती है? क्या भ्रष्टाचार सबसे बड़ा संकट है? क्या बेटियों के साथ होने वाले अपराध किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी विफलता हैं? या इन सबसे भी बड़ा संकट यह है कि समाज इन सबको देखकर भी चुप रहता है? शायद किसी भी लोकतंत्र की सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब अन्याय होता है, बल्कि वह होती है जब अन्याय को सामान्य मान लिया जाता है। जब लोग यह सोचकर अपने घरों में बैठे रहते हैं कि "यह मेरे साथ नहीं हुआ है", तब वास्तव में लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम बागचू का आमरण अनशन केवल एक व्यक्ति का अनशन नहीं है। वह एक प्रश्न है, जो इस देश के हर नागरिक से पूछा जा रहा है—क्या तुम अभी भी सोए रहोगे? क्या तुम अपनी बारी आने का इंतज़ार करोगे? क्या तुम्हें तब तक दर्द महसूस नहीं होगा, जब तक अन्याय तुम्हारे अपने घर की चौखट पर दस्तक नहीं देगा? कहा जा रहा है कि वे बेरोज़गारी, कथित पेपर लीक, भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा और व्यवस्था में बदलाव जैसे मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठे हैं। इन मुद्दों पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन एक बात निर्विवाद है कि ये विषय समाज में लंबे समय से चिंता और बहस का हिस्सा रहे हैं। असली प्रश्न यह नहीं कि अनशन करने वाला कौन है; असली प्रश्न यह है कि जिन समस्याओं की बात की जा रही है, क्या वे वास्तव में हमारे समाज में मौजूद नहीं हैं? यदि मौजूद हैं, तो हम सबकी भूमिका क्या है? लोकतंत्र में सरकारें आती हैं, जाती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, कानून बनते हैं, लेकिन यदि समाज स्वयं जागरूक न हो तो कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकती। आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि हमने अपनी नागरिक जिम्मेदारी दूसरों के कंधों पर छोड़ दी है। हमें लगता है कि कोई नेता आएगा, कोई समाजसेवी आएगा, कोई न्यायालय सब ठीक कर देगा, कोई पत्रकार आवाज़ उठा देगा, कोई आंदोलन कर देगा और हम घर बैठकर मोबाइल पर उसकी खबरें देखते रहेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि किसी भी देश में परिवर्तन दर्शकों ने नहीं, बल्कि सहभागी नागरिकों ने किया है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम इसलिए सफल नहीं हुआ कि केवल कुछ महान नेताओं ने संघर्ष किया। वह इसलिए सफल हुआ क्योंकि धीरे-धीरे करोड़ों सामान्य भारतीय उनके साथ खड़े हुए। महात्मा गांधी का दांडी मार्च यदि केवल गांधीजी का मार्च रह जाता, तो शायद उसका प्रभाव इतना व्यापक न होता। भगत सिंह की आवाज़ यदि युवाओं के दिलों तक न पहुँचती, तो वह केवल अदालत की चारदीवारी में सीमित रह जाती। डॉ. भीमराव आंबेडकर यदि केवल अकेले संघर्ष करते और समाज साथ न देता, तो सामाजिक न्याय की लड़ाई इतनी दूर तक न पहुँचती। जयप्रकाश नारायण का आंदोलन इसलिए इतिहास बना क्योंकि युवाओं ने उसे अपना आंदोलन बना लिया। लोकतंत्र में आंदोलनों की परंपरा केवल विरोध की परंपरा नहीं रही है, बल्कि सुधार, जागरण और उत्तरदायित्व की परंपरा रही है। जब भी सत्ता, समाज या व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस हुई, तब लोगों ने संविधान के दायरे में रहकर अपनी आवाज़ उठाई। आंदोलनों ने कानून बदलवाए, नीतियाँ बदलीं, सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी और नागरिकों को उनके अधिकारों का एहसास कराया। आज प्रश्न यह है कि वही समाज कहाँ चला गया? आज का युवा सोशल मीडिया पर घंटों बहस कर सकता है, लेकिन क्या वह किसी जनहित के मुद्दे पर एक दिन सड़क पर खड़ा हो सकता है? वह किसी फिल्म, क्रिकेट मैच या इंटरनेट ट्रेंड को लाखों बार साझा कर सकता है, लेकिन क्या वह किसी छात्र के साथ हुए अन्याय, किसी बेरोज़गार की पीड़ा, किसी बेटी की सुरक्षा या किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ बुलंद कर सकता है? शायद हम सुविधाभोगी समाज बनते जा रहे हैं। हमें तब तक कोई समस्या दिखाई नहीं देती जब तक उसका असर हमारे निजी जीवन पर न पड़े। यदि किसी और का पेपर लीक हुआ है, तो हमें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारा बच्चा उस परीक्षा में नहीं बैठा था। यदि किसी और की बेटी के साथ अपराध हुआ है, तो हमें लगता है कि वह किसी दूसरे परिवार की त्रासदी है। यदि कोई बेरोज़गार दस साल से नौकरी की प्रतीक्षा कर रहा है, तो हम सोचते हैं कि वह उसकी समस्या है। यदि कोई किसान आत्महत्या करता है, तो हम उसे अख़बार की एक खबर समझकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन समाज इसी तरह धीरे-धीरे संवेदनहीन बनता है। आज जो समस्या किसी और की है, वही कल आपकी भी हो सकती है। यही कारण है कि राहत इंदौरी की पंक्तियाँ आज भी हमारी अंतरात्मा को झकझोरती हैं— "आग लगेगी तो आएँगे कई घर ज़द में, यहाँ सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।" यह केवल शायरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच है। अन्याय कभी सीमाओं में कैद नहीं रहता। यदि उसे समय रहते नहीं रोका गया, तो वह फैलता है। बेरोज़गारी केवल बेरोज़गार की समस्या नहीं रहती; वह पूरे समाज की आर्थिक गति को प्रभावित करती है। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत देने वाले दो लोगों का मामला नहीं रहता; वह पूरी व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध केवल एक परिवार का दुख नहीं होते; वे पूरे समाज की असफलता बन जाते हैं। यदि हम चुप रहेंगे, तो समस्याएँ समाप्त नहीं होंगी; वे केवल बड़ी होती जाएँगी। सबसे दुखद बात यह है कि जब कोई व्यक्ति अपनी जान की परवाह किए बिना समाज के मुद्दों को उठाने की कोशिश करता है, तब भी समाज का बड़ा हिस्सा तमाशबीन बना रहता है। हम पूछते हैं—"इससे क्या होगा?" लेकिन कभी यह नहीं पूछते कि "यदि कोई आवाज़ भी नहीं उठाएगा, तो क्या होगा?" यदि हर व्यक्ति यही सोच ले कि कोई और आगे आए, तो फिर आगे कौन आएगा? लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता होती है, लेकिन जनता तभी शक्ति बनती है जब वह संगठित, जागरूक और जिम्मेदार हो। अधिकार कभी दान में नहीं मिलते; उन्हें जागरूक नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करके सुरक्षित रखते हैं। इसलिए समाज को यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध, जनहित के मुद्दों पर चर्चा, प्रश्न पूछना, जवाबदेही की माँग करना और संविधान के दायरे में रहकर अपनी आवाज़ उठाना भी उतना ही आवश्यक है। हमें किसी व्यक्ति की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, न ही किसी आंदोलन को बिना सोचे-समझे स्वीकार करने की। लेकिन यदि कोई नागरिक सार्वजनिक मुद्दों को उठा रहा है, तो कम-से-कम उन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना तो हमारा कर्तव्य है। हमें व्यक्ति नहीं, मुद्दों को देखना चाहिए। हमें चेहरे नहीं, चरित्र देखने चाहिए। हमें दल नहीं, देश देखना चाहिए। आज आवश्यकता किसी एक नेता, किसी एक समाजसेवी या किसी एक आंदोलन की नहीं है; आवश्यकता एक जागृत समाज की है। ऐसा समाज जो सवाल पूछने से न डरे, जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा हो, जो सच का साथ दे, जो संविधान पर विश्वास रखे और जो यह न सोचे कि "मेरा क्या जाएगा।" क्योंकि इतिहास उन लोगों को याद नहीं रखता जो केवल दर्शक बने रहे; इतिहास उन्हें याद रखता है जिन्होंने अपने समय की चुनौतियों के सामने मौन रहने से इनकार किया। आज यदि हम चुप हैं, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे भी प्रश्न पूछेंगी कि जब देश कठिन सवालों से जूझ रहा था, तब तुम कहाँ थे? क्या तुम केवल अपने परिवार, अपनी नौकरी, अपने मोबाइल और अपने आराम में व्यस्त थे? या तुमने एक जिम्मेदार नागरिक होने का धर्म निभाया? यह लेख किसी सरकार के विरोध या समर्थन का नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास है। लोकतंत्र सरकारों से नहीं, जागरूक नागरिकों से जीवित रहता है। यदि जनता सो जाएगी, तो लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था बनकर रह जाएगा; लेकिन यदि जनता जाग जाएगी, तो वही लोकतंत्र देश की सबसे बड़ी शक्ति बन जाएगा। इसलिए उठिए, सोचिए, पढ़िए, प्रश्न पूछिए, तथ्यों को समझिए, संविधान के मार्ग पर चलिए और हर उस मुद्दे पर अपनी शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आवाज़ दीजिए जो देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा है। क्योंकि याद रखिए—यदि आज भी हम अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे, तो शायद कल आवाज़ उठाने का अवसर हमारे हाथ से निकल चुका होगा।


✍️ लेखक: हरिन्द्र यादव